जिंदगी और मौत

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जिन्दा थे तो किसी ने
पास भी बिठाया नहीं,
अब खुद मेरे चरों
और बैठे जा रहे हैं|
पहले कभी किसी ने
मेरा हाल न पूछा
अब सभी आंसू
बहाए जा रहे हैं|
एक रुमाल भी भेंट नहीं किया
जब हम जिन्दा थे,
अब शालें और कपडे ऊपर
से ओढ़ाये जा रहे हैं|
सबको पता है की शालें और
कपडे इसके काम के नहीं
मगर फिर भी बेचारे दुनियादारी
निभाए जा रहे हैं|
कभी किसी ने एक वक्त का
खाना तक नहीं खिलाया,
अब देसी घी मेरे मूंह
में डाले जा रहे हैं|
जिंदगी में एक कदम भी
साथ न चल सका कोई,
अब फूलों से सजाकर
कंधे पे उठाए जा रहे हैं|
आज पता चला कि मौत
जिंदगी से बेहतर है,
हम तो बेवजह ही जिंदगी
कि चाहत किये जा रहे हैं|

— कैलाश गुप्ता
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11 responses »

  1. जीवनकाल में इस लायक बनना था कि लोग अपने आप से चीज़ें भेंट करते. अव्वल तो किसी और की भेंट कि ज़रुरत ही नहीं पदनी चाहिए… न किसी से कोई उम्मीद रखनी चाहिए. जिंदा आदमी पर दया दिखाना गलत बात है, क्योंकि ऐसा कर के हम उसे पंगु बना रहे हैं. मरे आदमी को असहाय, (सहायता के योग्य) मानकर यदि प्रतीकात्मक भेंट दी जा रही है, तो क्या इसे गलत माना जाए?

    कविता को true description कहना मुझे ठीक नहीं लगा. कवि सिर्फ अपनी angst व्यक्त कर रहा है. शायद कविता लिख कर खुद पर हँसा भी हो कि किस तरह की पराजयवादी मानसिकता व्यक्त की है. एक बार इस तरह सोच कर देखें.

    • I think it is more of an agony of a person suffering with hollow relationships rather than what should one do or not do in his life. In this poem at least, it is about empathizing with the author and not about the Truth.
      What you said is also an interpretation, which I appreciate 🙂

  2. @Devansh

    A person might have a lot of hollow relations, and a few strong ones. Even though to an outsider, it will look as if majority of the relations are hollow, it doesn’t really matter. Those few strong relations are enough.

    I agree with Aniket, his perceptions.

  3. I agree with comments of Mr Aniket. Motivating others and improving own self serve a better purpose in public communication rather than Satires

  4. @Anurag, Naresh Uncle:

    I hope nobody will deny that it is not only the perception of an outsider, but also we can see it in ourselves and in our relations, we can see such things happening. It is just the agony of the person troubled with such hollow relations.
    It is just the description of current reality, may not be the Truth!
    Aniket has interpreted it one way and Anurag and Naresh Uncle have interpreted it other ways and I am seeing it the other way. I am just empathizing with the author of this poem and appreciating his agony, nothing more …

  5. A thought provoking poem.

    On a lighter note… Zindagi itni bhi buri nahin hai… agar thik se apne charo aur dekho to tumhe chahne waala mil hi jayega aas paas..

  6. प्रो. नरेश जी, अनुराग, मेरी टिप्पणी का आपने संज्ञान लिया, इसके लिए धन्यवाद.

    देवांश, आपने संबंधों (रिश्तों) में खोखलेपन की बात की है. वाकई ये एक दृष्टिकोण हो सकता है इस कविता को देखने का. लेकिन जो उपमा (metaphor) कवि ने लिए हैं, उनमें यह बात पूरी तरह उभर का सामने नहीं आ रही है. कुछ अपेक्षाएं हैं इस कविता के नायक (protagonist) की, जो कि पूरी नहीं हुईं. ताली दो हाथ से बजती हैं. नायक अपने आप में कहाँ खड़ा था, क्या उसने जीवन में दूसरों के साथ न्याय किया, क्या उसने अपने आप के साथ न्याय किया, ये बातें स्पष्ट हुए बिना यदि आप कहते हैं कि कवि संबंधों में खोखलेपन की बात कर रहा है, तो इस बात का आधार मुझे बहुत मज़बूत नहीं लगता.

    कविता मुझे कटाक्ष (sarcasm) की तरह लगी है, एक ऐसे व्यक्ति पर जो कि दूसरों से अपेक्षाएं रखता है, और उनके पूरा न होने पर व्यथित है. यदि कटाक्ष नहीं, तो फिर मैं इसे कहूँगा कि कवि अपने मन की भड़ास निकाल रहा है. नहीं तो फिर ये पराजयवाद है – The poet is simply being a whiner. I can understand, but cannot sympathize and will not empathize with such a state of mind. let him whine. After sufficient time, he will get round to doing something about it.

    सम्बन्ध की यदि हम बात करें, तो मैं आपसे उम्र में कुछ कम हूँ. पर जो थोड़ा बहुत मेरा अनुभव हैं, उससे मुझे लगता है कि आपको कोई सम्बन्ध खोखला लगता है या घनिष्ठ, यह निर्भर करता है इस बात पर कि आपकी उस सम्बन्ध से अपेक्षा क्या हैं. सबसे बड़ा सम्बन्ध मुझे लगता है कि खुद के साथ होता है. यदि वो पूरा हो पा रहा हो, तो बाकी सब अपने आप आ जाता है, ऐसे मेरी समझ है. समझ परिपक्व (mature) है, ऐसा तो मैं नहीं कहूँगा, पर अभी जीवन की शुरुआत तो कम से कम इसी सोच के साथ करना चाहूँगा 🙂

    • Thanks Aniket.

      Definitely this poem could also be a sarcasm. I also wouldn’t doubt if somebody says that it is a reality because I have seen this happening in my own house.

      What you said about the author could be definitely true. He may not be able to fulfill expectations of others, he might not have done justice to relationships he was/is involved in. I see one thing here which is, generally a human being expects his expectations to be fulfilled by others around him, independent of what and how much he has fulfilled. When expectations of a person are not fulfilled then such kind of agony comes out. He find relationships empty.
      You are very much right that the person himself is responsible for his agony. At the same time I can also empathize with a person who may seem to be irresponsible in his behavior or words that how much it can hurt when expectations are not fulfilled.
      I can empathize with the person and when I do that I can appreciate the poem. In my opinion empathy is something which bring appreciation in us for many human emotions without classifying other person in the category of good or bad.

      With Regards,
      Devansh

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