Monthly Archives: January 2011

जिंदगी और मौत

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जिन्दा थे तो किसी ने
पास भी बिठाया नहीं,
अब खुद मेरे चरों
और बैठे जा रहे हैं|
पहले कभी किसी ने
मेरा हाल न पूछा
अब सभी आंसू
बहाए जा रहे हैं|
एक रुमाल भी भेंट नहीं किया
जब हम जिन्दा थे,
अब शालें और कपडे ऊपर
से ओढ़ाये जा रहे हैं|
सबको पता है की शालें और
कपडे इसके काम के नहीं
मगर फिर भी बेचारे दुनियादारी
निभाए जा रहे हैं|
कभी किसी ने एक वक्त का
खाना तक नहीं खिलाया,
अब देसी घी मेरे मूंह
में डाले जा रहे हैं|
जिंदगी में एक कदम भी
साथ न चल सका कोई,
अब फूलों से सजाकर
कंधे पे उठाए जा रहे हैं|
आज पता चला कि मौत
जिंदगी से बेहतर है,
हम तो बेवजह ही जिंदगी
कि चाहत किये जा रहे हैं|

— कैलाश गुप्ता
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