Monthly Archives: September 2010

किस ओर चली नदी

Standard

बेचैन रहती है नदी
क्यों सागर की खातिर,
मिलना जिसमें मिट जाना है …
खुद खार होना है

अनदेखा करती
चली जाती है
जंगल के प्यार को लेकिन
हरा होता है जो उस से
जिस में वह खुद
हरी होती है|

— नन्द किशोर आचार्य जी