Monthly Archives: July 2009

घटना और नियम

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घटनाओं को देख कर नियम समझ नहीं आता, परन्तु नियम समझ में आने पर घटनाएं स्वतः ही आपस में उस नियम की अनुरूपता में जुडी हुई नज़र आती हैं|

अधिकतर हम घटनाओं को देख कर नियम को समझने का प्रयास करते हैं| जैसे, एक पत्थर का जमीन पर गिरना एक घटना है| वह पत्थर जमीन पर क्यों गिर रहा है इसकी समझ नियम की समझ है| घटनाओं को देख कर नियम समझ नहीं आता| घटनाओं के आधार पर हम केवल किसी नियम के होने का अनुमान लगा सकते हैं, नियम के उस अनुमान के प्रति आश्वस्त नहीं हो सकते| जैसे एक पत्थर के जमीन पर गिरने के कई सारे कारण बताये जा सकते हैं जैसे, हर दो इकाइयां एक दूसरे को आकर्षित करती हैं, ठोस वस्तु ठोस वस्तु के साथ रहना चाहती है, पदार्थ पदार्थ के साथ रहना चाहता है, हर इकाई दूसरी इकाई से एक निश्चित दूरी पर रहना चाहती है और भी कई सारे अनुमान हम नियम के प्रति लगा सकते हैं| घटना क्रम को देख कर नियम के अनुमान को अक्सर हम वास्तविक नियम मान लेते हैं| नियम के प्रति बनी यह मान्यता तब तक बनी रहती है जब तक कोई ऐसा घटना क्रम उपलब्ध ना हो जो उस नियम की अनुरूपता में कार्यरत ना हो| जैसे ही ऐसा कोई घटना क्रम उपलब्ध होता है जो उस नियम की अनुरूपता में कार्य नहीं कर रहा हो या फिर जिसको उस नियम के आधार पर नहीं समझाया जा सकता हो, तो उस नियम को रद्द कर दिया जाता है या फिर उस नियम में फेर बदल कर के एक नए नियम का अनुमान लगाया जाता है जो पहले हो चुके घटना क्रमों तथा अभी नए उपलब्ध घटना क्रमों को समझ पाने में मदद करे| यह कार्य प्रणाली है प्रचलित विज्ञानं की, घटनाओं को देख कर नियम को समझने का प्रयास करना| प्रचलित विज्ञानं में ऐसा माना जाता है कि नियम के इस अनुमान में फेर बदल तब तक होती रहेगी जब तक अस्तित्व में होने वाली सारी घटनाएं उस नियम के आधार पर समझाई न जा सकें| उस नियम को समझ पाने को तथा उस नियम को वे लोग “युनिवर्सल थ्योरी ऑफ़ एवेरिथिंग” कहते हैं|

अगर हम मानव तथा मानवीय व्यवहार की बात करें तो उसमें भी हम घटनाओं को देख कर ही कई सारे नियमों का अनुमान लगाते हैं| जैसे बचपन से अगर मैंने ऐसा देखा है कि लोगों के ऊपर चिल्लाओ तो वो नाराज़ हो जाते हैं तो मैं यह नियम की तरह अपने आप में स्वीकार लेता हूँ कि किसी भी मनुष्य के ऊपर चिल्लाया जाना उसे अच्छा नहीं लगता| फिर मैं यह भी देखता हूँ कई बार लोग नाराज़ नहीं होते अगर उनके ऊपर मजाक में चिल्लाया जाए, या फिर अगर दूसरा व्यक्ति यह बात समझ रहा है कि उसके ऊपर क्यों चिल्लाया जा रहा है तो भी कई बार वह नाराज़ नहीं होता, फिर कई साधुओं के बारे में सुनने में आता है कि वे नाराज़ ही नहीं होते| यहाँ पर यह समझ में आता है कि मैंने सबसे पहले जो नियम बनाया था “किसी को भी उसके ऊपर चिल्लाया जाना अच्छा नहीं लगता” उसमें बदलाव करने की आवश्यकता महसूस होती है, क्योंकि अब मेरा ध्यान कुछ ऐसी घटनाओं पर गया है जो कि मेरे बनाये हुए नियम के आधार पर समझाई नहीं जा सकती| अब मैं एक नया नियम बना लेता हूँ “किसी व्यक्ति के ऊपर चिल्लाये जाने पर वह नाराज़ होगा या नहीं यह उस व्यक्ति की मनोस्थिति और समझदारी पर निर्भर करता है”| अगर हम ध्यान से देखें तो हर व्यक्ति अपने आस पास में होने वाली घटनाओं चाहे वे मनुष्य से सम्बंधित घटनाएं हों या प्रकृति से सम्बंधित हों, उनके प्रति किसी न किसी नियम के होने का अनुमान लगाता ही है और उस नियम को तब तक सही माने रहता है जब तक कोई ऐसा घटनाक्रम उपलब्ध ना हो जो उनके द्वारा बनाये गए नियम के द्वारा समझाया न जा सके| अगर हम ध्यान से देखें तो विज्ञानं के काम करने का ढंग किसी भी अन्य मनुष्य के काम करने के ढंग से बहुत अलग नहीं है|

यहाँ पर एक अंतर जो एक सामान्य आदमी और एक वैज्ञानिक में नज़र आता है, वह है कि एक वैज्ञानिक कई कई सारे घटनाक्रमों से अवगत रहता है तथा पहले हुए अन्य वैज्ञानिकों के द्वारा अनुमान लगाये गए नियमों से भी वह अवगत रहा है| उसके पास कई सारे यन्त्र उपकरण भी रहते हैं जिनके द्वारा वह उन घटनाक्रमों का भी अवलोकन कर सकता है जिन्हें आँखों द्वारा सीधे सीधे नहीं देखा जा सकता| इन चीज़ों के कारण एक वैज्ञानिक के अवलोकन तथा विश्लेषण करने का दायरा बहुत ही बढ़ जाता है जो कि एक सामान्य आदमी के लिए संभव नहीं हो पाता| पर एक सामान्य आदमी और वैज्ञानिक दोनों की कार्य प्रणाली एक ही होती है “घटनाओं को देख कर नियम को समझने का प्रयास”|

यहाँ पर एक चीज़ और भी होती है वह है कि हर व्यक्ति समान घटनाओं को देख कर अलग अलग नियम के होने का अनुमान लगाता है और अपने द्वारा बनाये गए उस नियम को ही वास्तविक नियम मान लेता है| स्वयं के द्वारा बनाये गए इन नियमों के आधार पर ही वह दुनिया को देखता है| यही उसकी दुनिया के प्रति दृष्टि का आधार रहता है| क्योंकि अलग अलग लोगों ने समान घटनाओं के प्रति अलग अलग नियमों का अनुमान लगाया रहता है उसके कारण यह आंकलन कर पाना मुश्किल होता है कि किसके द्वारा बनाया गया नियम सही है या वास्तविक नियम है? या फिर कोई वास्तविक नियम है भी या नहीं? यह सब चीज़ें ही व्यक्तिनिष्ठता (subjectivity) को जन्म देती हैं कि यह आपका सच, वह मेरा सच और अंततः हम इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं कि “सबका अपना अपना सच होता है”|

यहाँ पर कुछ जो मूल प्रश्न खड़े होते हैं वे हैं, क्या घटनाओं को देख कर नियम को समझा जा सकता है? हमें नियम समझ कैसे आता है? हमें वास्तविक नियम की समझ कैसे होगी? कोई वास्तविक नियम है भी या नहीं?

इस चीज़ को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि समझना क्या है? हम समझते कैसे हैं? हमारे समझने की प्रक्रिया क्या है? हमारे ज्ञान में वृद्धि कैसे होती है?

उपरोक्त प्रणाली में अगर हम देखें तो यह दीखता है कि समझने के क्रम में हम घटनाओं का अवलोकन करते हैं और फिर उनके पीछे के नियम का अनुमान लगाते हैं| अगर हम यहाँ पर ध्यान से देखें तो यह दीखता है कि नियम का अनुमान हम विचार के आधार पर लगाते हैं| विचार स्वयं ही जितना हम जानते हैं उसके ऊपर निर्भर करता है| विचार का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है| विचार स्मृति के आधार पर काम करता है| जितना हम जानते हैं उसके आधार पर जो हम नहीं जानते उसको नहीं जाना जा सकता| जो हम जानते हैं उसके आधार पर जो हम नहीं जानते वहां पर कुछ नियम के होने का अनुमान लगाते हैं जो की वास्तविक नियम को जानने के लिए पर्याप्त नहीं होता| यह है विचार की सीमा| यहाँ पर यह तो समझ में आ जाता है कि विचार के आधार पर नियम को नहीं समझा जा सकता और हमारा संपूर्ण नियम को समझने का प्रयास विचार के आधार पर ही है|

यहाँ पर यह प्रश्न खडा हो जाता है कि अगर विचार के आधार पर हमारे ज्ञान में वृद्धि नहीं होती, हमें नियम समझ नहीं आ सकता तो हमारे ज्ञान में वृद्धि होती कैसे है?

जितना हम जानते हैं उससे अधिक का जानना अवलोकन के आधार पर होता है| यही अंतर है विश्लेषण और अवलोकन में| अवलोकन में विचार नहीं है| अवलोकन का अर्थ है बिना किसी पूर्वाग्रह के, बिना किसी मूल्यांकन के घटनाक्रम का दर्शन करना| ऐसा करने पर एक व्यक्ति की जितनी नियम को समझने की पात्रता होती है उसके अनुसार वह कुछ आगे की वस्तु का दर्शन कर पाता है| यह आगे की वस्तु का दर्शन ही उसके ज्ञान में वृद्धि करता है| विश्लेषण विचार के आधार पर काम करता है| जितना जानते हैं उसके आधार पर ही विश्लेषण काम करता हैं| जो नहीं जानते उसके होने का अनुमान विश्लेषण के आधार पर लगा सकते हैं| यह अनुमान केवल एक संभावना की तरह बना रहता है, वास्तविकता नहीं रहता| वास्तविकता का दर्शन तो केवल अवलोकन के आधार पर ही होता है|

यहाँ पर एक प्रश्न यह तो खडा होता ही है कि किसी नियम को समझने की पात्रता विकसित होती कैसे है? पात्रता का विकास कैसे होता है? या कैसे हो सकता है? इस बारे में मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा की धीरे धीरे सतत अवलोकन से पात्रता का विकास होता रहता है|

यहाँ पर एक उदाहरण लिया जा सकता है| “हर व्यक्ति संबंध को ही सहज रूप से स्वीकारता है ना कि विरोध को”, इस वाक्य का मूल्यांकन स्वयं में अवलोकन के द्वारा ही संभव है, विश्लेषण के द्वारा इस वाक्य के सही होने की संभावना नज़र आ सकती है पर इस तथ्य के प्रति विश्लेषण के द्वारा निर्विकल्प नहीं हुआ जा सकता| किसी तथ्य के प्रति निर्विकल्प हो जाना ही नियम की समझ है| यह केवल अवलोकन मात्र से ही संभव है| जब मुझे यह चीज़ अपने में नज़र आती है कि संबंध पूर्वक जीना ही मुझे सहज रूप से स्वीकार है तो मैं इसके अन्यथा और कुछ नहीं सोचता, संबंध को सुनिश्चित करने के लिए ही मेरे सारे प्रयास जारी रहते हैं|

यहाँ पर एक चीज़ और भी देखने में आती है कि इस तथ्य का मूल्यांकन कि “संबंध ही मुझे सहज रूप से स्वीकार है” यह मुझ में खुद में ही हो सकता है| कोई दूसरा व्यक्ति, कोई यन्त्र या कोई पुस्तक मुझे यह बात नहीं समझा सकती| दूसरा व्यक्ति, पुस्तक या यन्त्र केवल इस तथ्य की तरफ मेरा ध्यानाकर्षण मात्र कर सकते हैं पर मुझे समझा नहीं सकते| समझ में आने का काम तो खुद में ही होता है| बाहरी घटनाक्रम या आतंरिक घटनाक्रम के विश्लेषण से नियम `समझ नहीं आता| इनके अवलोकन से समझ में आने की संभावना उपलब्ध रहती है| जैसे आतंरिक घटनाक्रम का उदाहरण लें तो यह देखने में आता है कि जैसे ही विरोध का भावः हमारे मन में आता है तो हम परेशान हो जाते हैं यह एक घटना है इससे संबंध क्या है और संबंध में जीना ही सहज रूप से हर मनुष्य को स्वीकार होता है, यह नियम समझ नहीं आता| यह तो अवलोकन से ही समझ आता है| यहाँ पर यही देखने में आता है कि घटनाक्रम आतंरिक हो या बाहरी, घटनाक्रम को देख कर नियम समझ नहीं आता|

घटनाक्रम के आधार पर केवल गति पकडाई में आती है, स्थिति नहीं| जैसे सुख पूर्वक जीने कि चाहना, संबंध पूर्वक जीने कि चाहना, विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीने कि चाहना एक मनुष्य में नित्य ही बनी रहती है, यह नियम है, स्थिति है| जो चीज़ बनी रहती है, जो नियम है उसका प्रतिफल है घटनाक्रम, हर गति के मूल में कोई न कोई स्थिति है, नियम की अनुरूपता में होती हैं घटनाएं| घटनाओं को देख कर नियम समझ नहीं आता| लेकिन जब नियम समझ आता है तो उसकी अनुरूपता में घटनाएं स्वतः ही जुडी हुई नज़र आती हैं| जैसे जब मुझे यह समझ आता है कि हर व्यक्ति संबंध ही सहज रूप से स्वीकारता है तब मुझे यह चीज़ अपने आप ही समझ आ जाती है कि मनुष्य के सभी प्रयास संबंध को सुनिश्चित करने के लिए ही हो रहे हैं पर समझ कि कमी के कारण वह संबंध को सुनिश्चित कर नहीं पा रहा है| पर उसकी मूल चाहना संबंध को सुनिश्चित करने की ही है| साथ ही नियम जैसे संबंध पूर्वक जीने की चाहना, यह यन्त्र की पकडाई में नहीं आता| दूसरा व्यक्ति भी मुझे इसे नहीं समझा सकता जब तक मैं खुद इस पर ध्यान न दूं| नियम, स्थिति तो खुद में ही समझ में आता है|

यहाँ पर अगर हम वैज्ञानिकों तथा मनोवैज्ञानिकों के कार्य करने का तरीका देखें तो यही समझ में आता है कि वे केवल गति और उसमें भी मुख्यतः आवेशित गति का ही अध्ययन कर पाते हैं| जैसे एक इंसान अगर एक ही जगह पर शांति से बैठा हो हमारे मनोवैज्ञानिक कुछ निष्कर्ष पर नहीं पहुच सकते| मनोवैज्ञानिक मनुष्य के कार्य व्यवहार को ध्यान में रख कर वह ऐसा क्यों कर रहा है इसका आंकलन करते हैं| गति के आधार पर और उसमें भी आवेशित गति के आधार पर स्थिति को समझने का प्रयास करते हैं| वैज्ञानिक भी यही करते हैं गति के आधार पर स्थिति का आंकलन| उसमें भी मुख्यतः आवेशित गति| जैसे एक परमाणु में इलेक्ट्रोन न्यूक्लियस के चारों ओर घूम रहे हैं और उस परमाणु में बाहरी उर्जा देने पर उस परमाणु का कैसा आचरण होता है यह यन्त्र तथा प्रयोग विधि से देखने को मिलता है पर उस परमाणु में इलेक्ट्रोन न्यूक्लियस के चारों ओर क्यों घूम रहे हैं यह यन्त्र तथा प्रयोग विधि से समझ नहीं आता| आँखों या यंत्रों से तो आवेशित गति या गति ही दिखती है स्थिति तो न आँखों से और ना ही यंत्रों से दिखती है| स्थिति तो केवल मनुष्य ही देख सकता है| स्थिति कि समझ ही नियम कि समझ है|

अब प्रश्न यह खडा होता है कि नियम खुद में कैसे समझ आता है?

इसके उत्तर में मैं बस यही कहना चाहूँगा कि नियम या तो स्वयं में, से, के अनुसन्धान से समझ आ सकता है या फिर जिस व्यक्ति ने अनुसन्धान किया है उसके मार्गदर्शन में अध्ययन से|

इस बारे में तथा इससे जुड़े हुए विषयों पर आगे के कुछ लेखों में और चर्चा होगी|

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Interaction with Students on Domination – Joy of Understanding: Part 5

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This post is going to contain content of my remaining interactions.

For one of the sessions teachers in this school requested me to talk to students on teasing, taunting, domination etc. This session was conducted for 9th class students. They tease each other, taunt each other, make fun of each other, try to dominate each other.

We started the discussion. I asked them, “Do you tease each other?”

They said, “Yes”, with proud.

What it makes you feel when you tease each other?

They said many things like, Superiority, Fun, I am great, To push down other person, To pull the leg, To get noticed in people around, To make other person feel inferior, To feel good, To make other person feel that I am better than him etc.

OK, what is the motivation for you to do all this?

They probably did not understand the question rightly so I gave them one example “You want other person to look up at you”.

They said, “Yes”.

So, what other motivations are there for you to tease each other?

They said many things, Happiness, Respect, Recognition, Superiority, Craver to be looked up, Domination etc,

What it makes you feel when you are being teased?

If we feel other person is doing it out of fun then we also enjoy it, but if we feel that other person is doing it with the intention of looking down at us or hurt us then we feel angry, we feel uncomfortable etc.

Right.

OK, lets consider the second part of it when you feel that you are being looked upon down by other person, how do you feel?

We feel hurt.

What do you want to do then?

We want to take revenge and hurt other person.

Why?

To make him realize that I am not what he feels I am.

Right.

Suppose you make him realize that you are more than what he is considering you, then what?

I feel comfortable then.

And now if some other person looks down at you then you again start feeling uncomfortable, right?

Right.

So what is your basic desire in all this?

No concrete answer.

You want other person to Rightly Evaluate you.

When you feel that you are being under-evaluated like “You do not know anything” then how do you feel?

We feel uncomfortable.

When you feel that you are being over-evaluated like “You are absolute genius”, then how do you feel?

We feel good but we also know that this is not the case so we feel that other person is either making fun of us or he is considering me more than what I am.

You feel uncomfortable even in this, right?

Right.

So what is your basic desire?

To be rightly evaluated.

Exactly.

You want other person to rightly evaluate you. When you are being Rightly Evaluated then you feel happy, when you are not then you feel unhappy. This is what is respect.

When you feel that you are or will be looked upon down by other person then you want to dominate other person with the expectation that if I push him down then he will start looking up at me, but domination is not naturally acceptable to anybody.

How do you feel when you are being dominated?

We feel uncomfortable, angry, suffocated.

You look up at the person who is trying to dominate you or you feel bad about that person?

We feel bad about that person.

But you try to dominate with the expectation that other person will start looking up at you or you will feel superior, right?

Right.

So to seek acceptance of other person you try to dominate right?

Right.

Exactly. In fact if you notice then you want “Unconditional Acceptance” from other person. You want other person to Trust you and to Rightly Evaluate you all the time, independent of what you are doing, thinking, behaving. When other person is behaving as per your expectations and preferences then you feel good otherwise you feel bad, right?

Right.

You want other person to rightly evaluate you but are you able to evaluate other person rightly always?

No.

You want acceptance without any condition, independent of what you are doing thinking, behaving etc. but do you accept other person unconditionally or conditionally?

Conditionally.

What all are those conditions?

They did not understand the question rightly so I gave them an example, “Whom would you able to accept easily and comfortably, a white colored person or a black colored person”?

White colored person.

Right. This is what a condition.

We accept others on the basis of several conditions but want to be accepted unconditionally.

So can you tell me what other things/conditions are there in your acceptance towards other person?

They said things like, Gender, Physique, Intelligence, Way of thinking, Rank, Charm, Ada, Feeling towards us etc.

Right.

So try to identify your basic desire. Your basic desire is for Unconditional Acceptance. You want other person to Trust you and Rightly Evaluate you Unconditionally. Do not assume this thing to be true just because I am saying this, verify it on your own right.

once you start recognizing this expectation of Unconditional Acceptance then we can talk about how to fulfill this after that.

We discussed on several more topics in between the classes like,

1. Value and Price: Value of a thing is fixed in nature but price is created by a man and it keeps changing with time, space and individual. Like wheat, value of wheat is to nurture human body. It remains like this. It never changes with time, space and individual. But price of wheat keeps changing with time, space and individual like price of wheat in India is different and America is different. Price of wheat 10 years before was something else than what it is now.

2. Rich, poor and prosperous: Content of this can be seen on below link.

https://devanshmittal.wordpress.com/2009/04/12/rich-poor-and-prosperous/

I did not discuss the content of this entirely, but some part of it.

3. Difference between, Material, Plants, Animals and Humans.