Monthly Archives: May 2009

महत्वकांक्षा और प्रतिस्पर्धा

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जो जितना महत्वकांक्षी है उसने पैसे, प्रतिष्ठा और सम्मान को उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना है और वह उतना ही ईर्ष्यालु, घृणालु, प्रतिस्पर्धात्मक तथा हिंसक है|

बचपन से ही हमें यह सिखाया जाता है महत्वकांक्षी बनो, सफल हो, सबसे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो, कक्षा में प्रथम आओ इत्यादि| बचपन से ही पढाई का उद्देश्य हमारे लिए यही होता है, कक्षा में प्रथम आना, अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना, अपना और अपने माँ बाप का नाम रोशन करना, प्रतिष्ठा कमाना और बाद में एक ज्यादा पैसे कमाने वाली नौकरी को पा लेने की अपनी योग्यता को विकसित करना| हमारे शिक्षक भी यही सिखाते हैं| बचपन से ही हमें दूसरों के आधार पर अपना आँकलन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है| दूसरों से आगे निकलना, उनसे अच्छे अंक लाना, कक्षा में प्रथम आना इत्यादि| हमारे माता, पिता, अभिभावक, शिक्षक सभी हमें यही सिखाते हैं| अब हर बच्चा तो कक्षा में प्रथम आ नहीं सकता, तो इस प्रणाली में हर व्यक्ति हर दूसरे का प्रतियोगी है, सहयोगी नहीं| बचपन से ही हमें प्रतिस्पर्धात्मक बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है| किस चीज़ की प्रतिस्पर्धा? हर चीज़ की! चाहे वह खेल कूद हो, पढाई हो, रंग रूप हो, धर्मं हो, विचार हो, कपडे तथा उनको पहनने का तरीका हो, रहन सहन का ढंग हो, बात करने का तरीका हो या कोई भी चीज़ हो| प्रतिस्पर्धा हर चीज़ में हमारे अन्दर समायी हुई है| बच्चे दूसरे बच्चों से अंको में प्रतिस्पर्धा करते हैं और बड़े दूसरे बड़ों से अपने बच्चों के अंकों के आधार पर| बच्चे और बड़े दोनों ही प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं|

बचपन में होती है अंकों, कपडों, रंग रूप, खेल कूद में प्रतिस्पर्धा| बड़े होने पर होती है विचार, ज्ञान, पैसा, प्रतिष्ठा, धर्म, रंग रूप, पद, बल, बुद्धि आदि की प्रतिस्पर्धा| जैसे किसका विचार ज्यादा श्रेष्ठा है, कौन ज्यादा ज्ञानी है, कौन ज्यादा समाज में प्रतिष्ठित है, कौन सा धर्म ज्यादा उच्च है, कौन ज्यादा सुन्दर है, किसके पास ज्यादा पैसा है, किसका रहन सहन का ढंग ज्यादा उच्च है इत्यादि| यही प्रतिस्पर्धा जन्म देती है इर्ष्या, घृणा तथा हिंसा को| जो जितना महत्वकांक्षी है वह उतना ही प्रतिस्पर्धात्मक है| उसमें उतनी ही इर्ष्या की संभावना है, घृणा की संभावना है और वह उतना ही हिंसक है| जब तक यह महत्वकांक्षी व्यक्ति अपने आस पास के लोगों से आगे रहता है इसकी यह इर्ष्या, घृणा तथा हिंसा उसके अन्दर ही दबी रहती है पर जैसे ही उसके आस पास का कोई व्यक्ति उससे ऊपर उठने लगता है तो उसमें यह इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा विरोध का भावः जाग उठता है| अब वह दूसरा व्यक्ति उसे सहयोगी की तरह नहीं दीखता, उसे वह प्रतियोगी की तरह दिखने लगता है| उससे आगे निकलने की चाह उसमें प्रबल होने लगती है| इस चाह के चलते अब वह अपना पोषण करने के लिए दूसरे व्यक्ति का शोषण करने को भी तैयार हो जाता है| इसमें वह कई सारी चीज़ें करने को तैयार हो जाता है जैसे, दूसरे व्यक्ति को नीचा दिखाने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति को अपने सफलता के मार्ग से हटाने की कोशिश करना, दूसरे व्यक्ति का बुरा करने की कोशिश करना, यहाँ तक कि दूसरे व्यक्ति को ख़त्म तक कर देने की कोशिश करना| जितनी अधिक महत्वाकांक्षा, उतनी ही अधिक प्रतिस्पर्धा की भावना, उतनी ही अधिक इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा हिंसा की संभावना| ये है हमारा समाज जिसका हम सब मिल कर पोषण करते हैं|

अभी हमने जिस तरह के समाज कि रचना कर रखी है उसमें अधिक महत्वकांक्षी व्यक्ति ही अधिक से अधिक लोगों का रोल मोडल बना बैठा है| वही प्रतिष्ठा पा रहा है, उसका ही अनुसरण किया जा रहा है| वही दूसरे लोगों के लिए निर्णय लिए जाने के लिए प्रतिनिधि के रूप में चुना जा रहा है| उसी के उदाहरण अधिक अधिक से अधिक माँ, बाप, शिक्षक, अभिभावक अपने बच्चों को दे रहे हैं, वही सफल कहलाया जा रहा है| उसी को प्रेक्टिकल तथा दुनियादारी की कला में पारंगत माना जा रहा है| इन्ही महत्वाकांक्षियों ने जन्म दिया है हमारे इस लाभोंमादी अर्थशास्त्र को, भोगोंमादी समाजशास्त्र को तथा कमोंमादी मनोविज्ञान को| इस तरह के समाज में हर व्यक्ति महत्वकांक्षी बनने और अपनी महत्वकांक्षा को पूरा करने में लगा है जिसमें अगर उसे दूसरे व्यक्ति का शोषण भी करना पड़े तो वह उसके लिए तैयार है| इसी के कारण समाज में  भय तथा अन्य जो अव्यवस्थाएं हैं जो हम देखते हैं|

यहाँ एक चीज़ और भी है, जो जितना महत्वकांक्षी है उसने पैसे, प्रतिष्ठा और सम्मान को उतना ही अधिक मत्वपूर्ण माना है तथा संबंधों का उतना ही अधिक तिरस्कार किया है| इस महत्वाकांक्षा ने हमारी आँखों को इस तरह से चौंधिया कर के रखा है कि संबंध भी कोई मुद्दा है हमें समझ नहीं आता| हमारे लिए हर वह वस्तु जो हमारी प्रतिष्ठा को बढाएगी, प्रिय हो जाती है| यहाँ तक कि हम संबंधों को भी एक लाभ, आराम, मजा, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा तथा प्रतिष्ठा को बढाने के साधन के रूप में देखते हैं| जब तक हमारी यह महत्वकंशाएं पूरी हो रही हों संबंधों से तब तक ही हम उन्हें बनाये रखते हैं तथा महत्वाकांक्षा पूरी ना होने पर हम उनके प्रति उदासीन हो जाते हैं| अगर संबंधों को हमें महत्वाकांक्षाएं पूरा करने के लिए तोड़ना भी पड़े तो हम उसके लिए भी तैयार हो जाते हैं| देखने में आता ही है किस तरह से दो महत्वकांक्षी भाई पैसे, प्रतिष्ठा के लिए अलग हो जाते हैं| इस महत्वकांक्षा के जहर ने हमारे घरों को भी नहीं छोडा|

एक व्यक्ति के स्तर पर भी अगर हम देखें तो यही नज़र आता है कि इस महत्वकांक्षा के बोझ तले वह खुद भी दबा हुआ है| पैसे प्रतिष्ठा को उसने जितना महत्त्वपूर्ण माना है उतना ही उसमें भय व्याप्त है उसे ना पा पाने का या फिर उसे खो देने का या फिर और नहीं बढा पाने का| देखने में आता ही है किस तरह से एक बच्चा कक्षा में प्रथम ना आ पाने पर आत्महत्या कर लेता है| किस तरह से घर में चोरी हो जाने पर या पैसे प्रतिष्ठा को खो देने पर व्यक्ति महसूस करता है कि वह मिटटी में ही मिल गया| किस तरह से वह वह अपनी जोड़ी हुई प्रतिष्ठा को खो देने के भय से भयभीत रहता है|

अगर कुल मिलाकर के देखें तो यही देखने में आता है कि इस महत्वकांक्षा ने हमारे समाज, प्रकृति, घर, संबंध, मानव किसी को भी नहीं छोडा| हर जगह पर अव्यवस्था ही अव्यवस्था है| तो प्रश्न यहाँ पर यह खडा होता है कि यह सब हो कैसे गया? इसको समझने के लिए हमें स्वयं को समझने कि जरूरत है| आइये इस बारे में कुछ बात करें|

हर व्यक्ति स्वयं में सुख, विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना चाहता है| महत्वकांक्षा का सम्मान से काफी बड़ा संबंध है| सम्मान की सही समझ ना होने के कारण ही व्यक्ति ईर्ष्यालु, घृणालु, द्वेषी तथा हिंसक हो जाता है| जो जितना महत्वकांक्षी है उसने सम्मान, प्रतिष्ठा को उतना ही अधिक महत्त्वपूर्ण माना है, पर उसे सम्मान क्या है? प्रतिष्ठा क्या है? यह स्पष्टता नहीं रहती, जिसके कारण ही सारी समस्यायें हैं| सम्मान को समझने के लिए स्वयं को समझने की जरूरत है| सम्मान का अर्थ है स्वयं का सही मूल्यांकन| स्वयं में स्वयं की समझ के अभाव में इंसान दूसरे व्यक्ति की नज़रों से अपने आप को देखता है, अगर दूसरे व्यक्ति का नज़रिया उसके प्रति अच्छा है तो वह सम्मानित महसूस करता है नहीं तो असम्मानित| इसीलिए जो चीज़ें दूसरे व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं वे उसके लिए सम्मान तथा प्रतिष्ठा को सुनिश्चित करने का आधार बन जाती हैं और यहीं से शुरू होती है प्रतिस्पर्धा| जैसे अगर प्रचलन में एक बहुत ही बड़ा घर प्रतिष्ठा की वस्तु माना गया है तो हर व्यक्ति फिर बड़ा घर ही बनाना चाहता है|  प्रतिस्पर्धा के जन्म लेते ही जन्म लेती है इर्ष्या, घृणा, द्वेष तथा हिंसा|

हर व्यक्ति में अपने महत्व को जानने की आकांक्षा जन्म से ही रहती है पर व्यक्ति अपनी इस आशा से अनभिज्ञ रहता है जिसके कारण वह अपने महत्व को सापेक्षता में, दूसरे लोगों के देखने के आधार पर या स्वयं को किसी चीज़ से जोड़ लेने के आधार पर पहचानता है| बल्कि मुझे यह कहना चाहिए कि उसके ९०% से ऊपर कार्य अपने आप को महत्त्वपूर्ण मानने और मनवाने के लिए ही हो रहे हैं| देखने में आता ही है कि किस तरह से व्यक्ति अलग अलग चीज़ों से जुड़ जाता है स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस करने के लिए| किसी विशेष तरह के विचार से जुड़ जाना, समाज सेवा में लग जाना, किसी विशेष धर्म संप्रदाय से जुड़ जाना, बड़ी बड़ी डिग्रियां हासिल कर लेना, बड़ा घर बना लेना, किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का सान्निध्य प्राप्त करने कि कोशिश करना, सुन्दर बने रहने का प्रयास करना, अजीबो गरीब तरह के वस्त्र पहनना, अजीबो गरीब भाषा का प्रयोग करना और भी कई सारी चीज़ें हम करते रहते हैं स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस करने के लिए और अपना महत्व दूसरे व्यक्ति को जताने के लिए| यहाँ पर एक चीज़ और भी होती है कि जिस वस्तु के आधार पर व्यक्ति अपने महत्व को पहचानता है उस वस्तु के ऊपर अगर कोई ऊँगली उठा दे तो वह व्यक्ति उसका विरोधी हो जाता है, घृणा, इर्ष्या तथा विरोध का भावः उस व्यक्ति के लिए उसके मन में आने लगता है| जिस भी वस्तु के आधार पर वह अपने महत्व को पहचानता है उसकी यह अपेक्षा रहती है कि उसके आस पास के लोग भी उसको उसी वस्तु के आधार पर महत्त्वपूर्ण मानें| जैसे अगर में स्वयं को ज्ञानी मानता हूँ तो मेरी अपेक्षा रहती है मेरे आसपास के लोग भी मुझे ज्ञानी मानें| जो लोग मानते हैं वे मुझे प्रिय हो जाते हैं, जो नहीं मानते वे मुझे विरोधी कि तरह नज़र आते हैं| ये है हमारी महत्वाकांक्षा| इन सब में यही देखने में आता है कि इनमें से किसी भी चीज़ के आधार पर स्वयं में महत्त्वपूर्ण महसूस होने का जो भावः है उसकी निश्चितता, निरंतरता, स्थिरता नहीं बनी रहती| आज जो चीज़ प्रचलन में है अगर कल वह नहीं रहती तो मेरा मूल्य घट जाता है| आज जो व्यक्ति मुझे अच्छा देख रहा है अगर वह कल अच्छा नहीं देखता तो मेरा मूल्य घट जाता है| फिर मुझे दोबारा से महत्त्वपूर्ण होने के लिए तथा अपना मूल्य बढ़ाने के लिए कार्य करना पड़ता है| पूरा जीवन हम इसी दौड़ में निकाल देते हैं|

स्वयं में स्वयं के महत्व को जानने कि आकांशा मनुष्य में जन्म से ही रहती है| इसका प्रयोजन है मनुष्य अस्तित्व में अपने प्रयोजन को, महत्व को जाने, वास्तविकता को जाने| स्वयं में स्वयं की इस चाहना के ज्ञान के अभाव में व्यक्ति अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हिंसक बन जाता है और खुद भी दुखी रहता है| स्वयं के महत्व को जाने बिना इंसान तृप्त भी नहीं होता है| इसके लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि इंसान अपने ऊपर ध्यान दे और अपने ही अन्दर बनी हुई अपनी आकांक्षा को पहचाने और वह कैसे पूरी होगी इस बारे में पता लगाने का प्रयास करे| स्वयं में स्वयं के महत्व को जानने के लिए इंसान को ज्ञान चाहिए| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं, अस्तित्व तथा अस्तित्व में अपनी भागीदारी का ज्ञान|

अगर हम अपनी शिक्षा प्रणाली को देखें तो उसमें इंसान कि मूलभूत आवश्यकता के बारे में कोई बात नहीं होती| हमारी शिक्षा प्रणाली अभी यही सिखाती है कि आप महत्वकांक्षी बनिए,  पैसे और प्रतिष्ठा बढ़ाने की अपनी योग्यता को विकसित कीजिये| यही है आज की शिक्षा जो अधिक से अधिक ईर्ष्यालु, घृणालु, द्वेषी और हिंसक लोगों को जन्म दे रही है| शिक्षा में “स्वयं का अध्ययन” के पक्ष को लाना अत्यंत ही आवश्यक है|

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संबंध एक दर्पण है

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संबंध एक ऐसा दर्पण हैं जिसमें आपको आपकी असली सूरत नज़र आती है|

एक दर्पण तो वह है जिसमें आप अपना शारीरिक चेहरा देखते हैं, दूसरा दर्पण यह संबंध है जिसमें आपको आपकी असली सूरत नज़र आती है| संबंध के बिना अपने आप को जान पाना अत्यंत ही कठिन कार्य है| संबंध में ही हमें पता लगता है कि हम असलियत में क्या हैं| शायद आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं जाने क्या बात कर रहा हूँ, कौन सा दर्पण? क्या जानना होता है संबंध में? आइये इस बारे में कुछ बात करें|

अक्सर हम लोग संबंध को अपनी एक मनोवैज्ञानिक, मानसिक, भावात्मक, भावनात्मक, आर्थिक आदि सुरक्षा प्रदान करने के एक स्रोत कि तरह देखते हैं| ऐसा मानने के मूल में संबंध की समझ का अभाव ही है| संबंध जरूरत पूरा करने का साधन नहीं है| इस तरह की निर्भरता को पूरा करने के आधार पर बनी हुई संबंध में स्वीकृति की स्थिरता नहीं बनी रहती| स्वयं में स्वीकृति की अस्थिरता स्वयं में दुःख का कारण बनती है| अगर यहाँ तक आपकी और मेरी सहमति है तो हम आगे की बात कर सकते हैं जिसमें हम संबंध दर्पण किस तरह है इस बारे में बात कर सकते हैं|

यहाँ तक हमें यह तो समझ में आ ही गया है कि स्वयं में स्वीकृति, विश्वास का अभाव ही स्वयं में दुखों का कारण है| संबंध में ही हमें यह देखने को मिलता है कि हमारी दूसरे व्यक्ति से क्या अपेक्षाएं बनी हुई है, दूसरे व्यक्ति के नज़रिए का हम पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, हम अपने आप को किस तरह देखना, दिखाना चाहते हैं, हम दूसरे व्यक्ति से क्या पाना चाहते हैं, हमें संबंध में क्या अच्छा लगता है, क्या नहीं लगता है, कैसा होना हमें पसंद है, कैसा नहीं है, क्या हमें सहज रूप से स्वीकार है, क्या नहीं है, हमारे अन्दर दूसरे व्यक्ति के प्रति क्या भावः बन रहा है, हमारे अन्दर बना भावः किस तरह से हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो रहा है, किस तरह से संबंध बदल रहे हैं, किस व्यक्ति से बात करते हुए हम अपने आप में कितने आराम में हैं, किस व्यक्ति को हम किस नज़रिए से देखते हैं, हमारे अन्दर किस तरह के आकर्षण हो रहे हैं, किस तरह के प्रत्याकर्षण हो रहे हैं, किस तरह की प्रतिमा हमने अपने मन में अपनी बना रखी है, संबंध में मिलने वाले सुख के होने पर बाकी चीज़ों पर हमारी निर्भरता किस तरह से कम हो रही है और यह सब क्यों हो रहा है इस सब कि तरफ भी एक अच्छा खासा ध्यानाकर्षण संबंध में ही हो पाता है| बिना संबंध के यह ध्यानाकर्षण खुद पर हो पाना एक अत्यंत ही कठिन काम है| इसीलिए मैंने कहा कि संबंध एक ऐसा दर्पण है जिसमें हमें अपनी असली सूरत नज़र आती है|

स्वयं में यह ध्याकर्षण ही स्वयं में अवलोकन की क्रिया को प्रोत्साहन प्रदान करता है, उसे आगे बढाता है, स्वयं को समझने में मदद करता है तथा स्वयं के भावः में अधिक स्थिरता लाता है| स्वयं में भावः की स्थिरता तथा स्वयं में विश्वास ही स्वयं में सुख है और यह स्वयं की समझ के बिना नहीं आ सकती|

Internal and External Fear

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Lets try to understand what Internal Fear is? Here I am not going to talk much about external fears like fear of loosing money, fear of being killed, fear of loosing job, fear of not having food to eat, fear of natural calamity, fear of wild animals etc. Do you have any more fears than these external fears? If we look within then we will realize how many fears we have inside us, how much troubled our internal state is, to what extent we are doing slavery of others, how much partantra we are. Till the time we do not do this exploration we feel that we are already swatantra or we do not have any such kind of fear within us. In this process of exploration we also begin to realize that the external fears which we have, which we face are the consequences of these internal fears only, which are residing inside a human being, to which he is not aware of, to which he has never paid attention, from which he has always been running away in one form or the other.

What are those internal fears? Fear of loosing acceptance of people around, fear of loosing respect, fear of being wrongly interpreted, fear of loosing trust of people around, fear of being considered “less”, fear of loosing importance, fear of loosing psychological security, fear of loosing dear ones and many more. Do you feel that you have these fears? You might say no, but in reality you might find many. Till the time we do not do this exploration we feel that we are free from these fears and others have them and we keep judging them and criticizing them. With more and more exploration we begin to realize that we are no different from a rapist, terrorist, murderer, criminal, a office goer, a corporate leader, a labor or any other man. It just requires a bit more of exploration within. Lets talk about some internal fears in different sections.

Fears in Relationships:-

Generally what we call Relationships in general language are based on our Attachments/Attractions. We make a image of other person is our mind. If that image suits/matches to our imagination of a good person then we start liking that person. With more and more time with that person dependence of our Happiness on that person keeps increasing. This what is Attachment. It always comes with fears. Fear of loosing acceptance of other person, fear of change in thinking, feelings and behavior of other person towards us. As soon as it changes we get hurt and then blame other person that he/she breached my trust. We want his acceptance back on any cost. We want him to be same with us on any cost. We get angry if that doesn’t happen.

This kind of fear is coming out of dependence. In such kind of dependence we are always uncertain about other person’s feeling, thinking and behavior towards us. We want consistency in other person’s feelings, thinking and behavior towards us in this case. If this doesn’t happen then we get hurt. This uncertainty, this fear, this contradiction within, these arguments which keep happening within us keep troubling us continuously.

We are lonely inside. We want to get rid of this loneliness. We keep searching for somebody who can quench this thirst in us which is manifesting itself as loneliness. When we get that person we get attached. Parellely we get fears of loosing. When other person with whom we are attached changes with us, we get hurt. A feeling of opposition, hatred, jealousy start coming in us. We keep troubling ourselves.

Fears of loosing value:-

Generally we recognize our value with association of something with us. If I have something which makes me valuable then I feel that “I am” if I do not have any such thing then I feel “I am not”. I like to feel that “I am” but it comes with several, several fears along with it. Like I say that I am beautiful, I am intellectual, I am intelligent, I am at a very high position, I am powerful, I am knowledgeable, I have contacts with many great people, I have good English, I am of a particular religion, I am associated with a particular thought etc. We recognize our value in association with something. We feel comfortable and good with those who give value to us for the thing for which we consider ourselves valuable and we feel uncomfortable with those who look down at us for the thing with which we recognize our value. Like if I feel that I am a knowledgeable person then those who also consider me a knowledgeable person, I feel comfortable and good with them. Those who do not I feel uncomfortable with them. I start getting a feeling of opposition for them. If they look down at me and show me that I do not know anything then I start feeling jealous, a feeling of hatred start coming into my mind for them, I even become violent. Similar may be the case if I recognize my value on the basis of say, power, beauty, money, intellect, contacts etc.

If I meet a person who is “more” than me in the thing for which I recognize my value, then I start feeling “less” and I want to become “more”. This gives rise to a rat race, competition, jealousy, hatred and violence. Unfortunately we all are into it. All the religious wars, other wars, competitions, rivalries have their root cause in this.

What we also generally try to do is to use our “Will Power” to control this fear, but it doesn’t control it rather it creates an environment of suffocation within. Like I say, “I will not have fear of loosing value or I will not get attached now” but this doesn’t happen. “Will Power”, Suppression don’t control fears rather creates suffocation within.

Consequences of Internal Fears:-

All these rivalries, quarrels, wars, religious riots, altercations, oppositions, hatred, jealousy, competitions, violence are the outcome of this internal fear only. Due to this internal fear only we make an environment which causes external fears like wars between countries, insecurities in countries, wars and insecurities within the countries, lack of production, more and more of consumption, lack of assurance in continuity of production, lack of assurance in distribution, insecure environment, insecurity in job, insecurity in living, insecurity in relationships, lack of assurance in relationships, altercations in family, unhappiness within, fear within, insecurity within.

This all starts with this internal fear. What we are currently trying to do is to change the external environment to get rid of this fear, but in reality it is the internal environment which need to be changed to get rid of internal as well as external fears. Like what we do is we accumulate more and more weapons so that we are secure from other country, we accumulate more and more power and resources so that we have the assurance of security and resources needed in future. We make rules and regulations, law and order to control the society and individual to maintain harmony, we do division of property and several judicial activities in family to maintain the harmony and several more thing in which instead of making the place harmonious we are making it more and more fearful. At the level of individual we try to get associated with something so that we are valued by others and we become psychologically secure. Change has to come inside the human being and not in the system which human has made. Without the change inside the human being the change which is made outside is not going to be sustainable. It is not going to make a human being fearless.

Escapism:-

If we see ourselves then almost all our activities are happening for the sake of escaping from fear rather than to understand it. When we are lonely we go to some restaurant, to a movie, to some amusement park or to some other place where we feel we will have fun. We make new friends or we keep searching for somebody who can make us feel good to get rid of this loneliness which is residing within us and is killing us continuously. We leave the friends who are now unable to make us feel good and make new friends. We get associated with a new group, get associated with a new thought, new set of people, make a new guru, start reading new books and other things. Most of the time the thing which we are doing is the escapism from the fear. We try to substitute fear with a thing which can not be substituted by that and it rather gives rise to many other problems which we have already seen. We see that there is something missing in our lives which we do not know what that is and we search that thing in those things which can give us that. This is what is escapism.

Cause of Fear and a word towards solution:-

In one line it can be said that cause of internal fear in a human being is lack of understanding of him himself in him and ultimately this internal fear itself becomes the cause of all the external fears, insecurities, lack of peace, wars, world wars etc.

Due to lack of understanding in a human being of him himself, he recognizes himself in association with something like power, position, beauty, intellect, contacts with others, others perception towards him etc. This is what becomes the cause of attachment, cause of wrong evaluation of oneself, ego in oneself and expectation from others to keep the evaluation consistent, right and good. When others do that a human being feels good other wise bad and start getting a feeling of opposition for other person. This feeling of opposition for other person comes due to lack of understanding of oneself only. This feeling of opposition within ultimately becomes the cause of violence outside, so it is the internal environment which needs to be changed in a human being.

Ultimately the content of study for a human being is him himself. Due to lack self knowledge we blame others for this feeling of breach of trust, disrespect, opposition, hatred, jealousy and many others and then want to change them. This process leads to violence.

In our entire education system we give only technical education, trained to compete, trained to become violent, trained for race, trained to become more and more successful and accumulate more and more. The more one accumulates the more is given respect, recognition. The more is one valued. Current education system is generating violent literates rather than responsible educated people. In this education the thing which is taught is, “How to earn a living?” but there is no education on “How to live?”. Effectively we training people how to make a knife without teaching them what it is used for and what is its purpose, so it is being used for murders.

At this point it is clear that there is a need for increase in human understanding of himself. What is the content of this understanding? There are only two questions which a human being has in his life. What he wants? and How can he achieve it?

What he wants? Happiness, Prosperity, Relationships, Fearlessness in Society and Co-existence in Nature.

How can he achieve it? With increase in understanding in every individual about Self, Relationships, Trust, Respect, Prosperity, Family, Fearlessness, Society and Nature. This entire thing need to be included in the course of study in education system.

हम जानवर हैं या इन्सान?

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जानवर के लिए जीना ही एक मात्र मुद्दा है| जानवर चार आयामों में जीता है, आहार, निद्रा, भय और मैथुन| वह बस खाता पीता है, सोता है, वातावरण की अनुकूलता खोजने में लगा रहता है और अपने वंश को आगे बढाता है| उसके लिए सोचने विचारने के लिए यही ४ मुद्दे हैं| अगर उसका पेट भरा हुआ हो, वातावरण शरीर के लिए अनुकूल हो, आस पास में कोई घातक जानवर न हो तो उसे उससे ज्यादा कुछ की आवश्यकता नहीं रहती| जब उसे भूख लगती है तब वह खाने की तलाश में निकलता है| खाना अगर बहुतायत में उपलब्ध हो तो वह उसकी शरीर की आवश्यकता के अनुसार ग्रहण करता है तथा बाकी वहीँ पर छोड़ देता है| अगर खाना बहुतायत में उपलब्ध नहीं है और खाने वालों की तादात ज्यादा है तो वह छल कपट तथा हिंसा पर भी उतर आता है| अपने शरीर को सुरक्षित रखना, उसको पोषण देना, उसको बाकी जंगली जानवरों से बचाना, उसको वातावरण की अनुकूलता प्रदान करना, यही जानवर के जीने का मूल उद्देश्य है| जानवरों में कुछ हद तक आसपास की चीज़ों को जोड़ पाने की क्षमता या जोड़ कर के देख पाने की क्षमता दिखाई पड़ती है| जानवर में मानने की क्षमता दिखाई पड़ती है|  जैसे एक कुत्ता यह पहचान पाता है कि उसका मालिक कौन है और कौन नहीं है| मालिक के ऊपर वह नहीं भौंकता पर दूसरों पर वह भौंकता है| कुत्ते के सामने आप पत्थर उठाओ तो भागता है| उसमें यह मानने के क्षमता तथा चीज़ों को जोड़ कर देखा पाने की क्षमता कुछ हद तक विकसित रहती है जिसके कारण वह इस तरह की चीज़ों को भी समझ पाता है| जानवर मूलतः घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही करता है| घटनाओं के पीछे के नियम को नहीं समझ पाता, फलतः नियमबद्ध होकर नहीं जी पाता तथा उसकी उसे आवश्यकता भी महसूस नहीं होती|

अगर हम इंसान के जीने को देखें तो वह भी जानवर के जीने से बहुत अलग नहीं है| इंसान भी आज इन्ही चार आयामों में ही जी रहा है, आहार, निद्रा, भय और मैथुन| इंसान भी बस खाता पीता है, सोता है, सेक्स करने को लालायित रहता है, वातावरण की अनुकूलता खोजता रहता है, जहाँ अच्छा लगने की अपेक्षा रहती है वहां भागता है, जहाँ अच्छा नहीं लगता वहां से दूर भागता है| जिन लोगों के साथ जब तक अच्छा लगे तब तक उनके साथ में रहता है अच्छा ना लगने पर उनको छोड़ देता है| कुल मिलाकर खाने पीने, सोने, सेक्स करने, पैसा प्रतिष्ठा कमाने और “अच्छा लगने” के पीछे भागने के अलावा कुछ नहीं करता है| उसके जीवन में मुख्य काम वातावरण की अनुकूलता खोजना और उसके पीछे भागना ही रहता है| हम भी घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही करते हैं और अधिकतर घटनाओं के पीछे के “क्यों” को, नियम को नहीं समझे रहते|

इंसान में “मानने” की क्षमता तथा घटनाओं को आपस में जोड़कर देख पाने कि क्षमता जानवर से कहीं अधिक विकसित रहती है| इंसान खुद इंसान में, प्रकृति तथा अस्तित्व में होने वाली घटनाओं को जानवर से ज्यादा अच्छा जोड़, तोड़ कर देख पाता है| जैसे वह ये देख पाता है कि बीज को जमीन में डालने पर तथा उचित ताप, दाब, हवा, पानी, मिटटी तथा उर्वरकता उपलब्ध होने पर बीज अंकुरित होना चालू कर देता है तथा उसमें विकास होने लगता है| इस तथ्य तथा इससे जुड़े हुए अनेकों अन्य तथ्यों को वह जोड़कर खेती कर पाने में सक्षम हो पाता है, अपने भोजन का खुद उत्पादन कर पाने में सक्षम हो पाता है| उसी तरह कई सारे प्रयोग कर के वह कई सारी और भी घटनाएं आपस में जोड़ तोड़ पाता है और नई नई चीज़ों का अविष्कार कर लेता है| ऐसी घटनाएं जिन्हें वह आँखों से या इन्द्रियों से नहीं देख पाता वह उन घटनाओं को देखने के लिए कई सारे यंत्रों का निर्माण भी कर लेता है| यंत्रों कि सहायता से वह उन सूक्ष्म घटनाओं को देखकर कई सारी चीज़ों को आपस में जोड़ पाता है| जैसे बिजली का अविष्कार| लोहे के तार के आसपास चुम्बक को घुमाने पर तार में बिजली के प्रवाह को वह देख पाता है| बिजली का दूसरी चीज़ों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है उसे भी वह समझ पाता है और कई दूसरे यंत्रों का निर्माण कर लेता है| यहाँ पर यही समझ में आता है कि इंसान में यह घटनाओं को आपस में जोड़कर देख पाने कि क्षमता जानवर से कहीं कहीं अधिक विकसित है| इन घटनाओं को आपस में जोड़ कर के देख पाने कि क्षमता को उपयोग में लाना और यन्त्र उपकरण बना लेना ही प्रचलित विज्ञानं है|

लोगों से व्यवहार में भी हम अपने ही द्वारा बनाई गई मान्यताओं के आधार पर ही उनके प्रति भावः रखते हैं तथा उस भावः के आधार पर ही उनके साथ व्यवहार करते हैं| जब दूसरे व्यक्ति का व्यवहार हमारी अच्छे के प्रति मान्यताओं की अनुरूपता में होता है तब हम उस पर विश्वास कर पाते हैं तथा सम्मान कर पाते हैं| जो व्यक्ति हमें महत्त्वपूर्ण होने का भावः महसूस करते हैं, मनोवैज्ञानिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं, आराम पहुचाते हैं हम उन पर विश्वास कर पाते हैं तथा अन्य पर विश्वास नहीं कर पाते| जिन वस्तुओं के आधार पर हम स्वयं महत्त्वपूर्ण महसूस करते हैं या जिन वस्तुओं को हम महत्त्वपूर्ण मानते हैं, जिन लोगों के पास वे वस्तुएं हो उनको सम्मान की नज़र से देखते हैं| यहीं तक सीमित रहती हैं हमारी संबंध, विश्वास तथा सम्मान की समझ| जिन लोगों के साथ में हमें समझे जाने, महत्त्वपूर्ण होने, सुरक्षा का भावः महसूस होता है हम उनकी तरफ आकर्षित होते हैं| जिनके साथ में नहीं होता उनसे प्रत्याकर्षित होते हैं, दूर भागते हैं| जो हमें महत्वहीन महसूस कराते हैं उनके हम विरोधी हो जाते हैं, उनसे हम घृणा का भावः रखते हैं, इर्ष्या उनके प्रति हमारे मन में आ जाती है और हम उनको नीचा दिखाने तथा परेशान करने की योजनायें बनाने लग जाते हैं|

यहाँ पर यही समझ में आता है की अभी इंसान भी घटनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही कर रहा है, वातावरण की अनुकूलता ही खोज रहा है, घटनाओं को आपस में जोड़ कर नयी नयी मान्यताएं ही बना रहा है पर घटनाओं के पीछे के नियमों को, मानव मानव संबंध को, विश्वास को, सम्मान को, प्रेम को अभी नहीं समझ पाया है| उसका जीना भी जानवर से बहुत अलग नहीं है| बल्कि अगर हम ध्यान से देखें तो आज के इंसान का जीना जानवर के जीने से भी बध्तर है| जानवर तो भोजन के कम होने पर ही दूसरे जानवर से छीना झपटी करता है, पर इंसान तो वस्तु के बहुतायत में होने पर भी छल कपट और हिंसा पर उतर आता है| जानवर में यह “और ज्यादा की हाय” दिखाई नहीं पड़ती, जो की इंसान में देखने में आती है| जानवर में यह अपनी पहचान बनाने, महत्त्वपूर्ण होने, पैसे, प्रतिष्ठा के प्रति होड़ दिखाई नहीं पड़ती जो इंसान में नज़र आती है|

एक और अंतर जो इंसान और जानवर में नज़र आता है वह है, जानवर में घटनाओं के मूल में “क्यों” को समझने की क्षमता नहीं है| इंसान में यह “क्यों” को समझ पाने की संभावना उपलब्ध है| इंसान ना सिर्फ घटनाओं को आपस में जोड़ पाता है बल्कि वे घटनाएँ ऐसे ही क्यों हो रही हैं यह समझ सकता है| जैसे, इंसान यह समझ पाता है कि हर इंसान हर क्षण विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीना चाहता है| विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीने कि चाहना इंसान में नित्य बनी रहती है| जब भी इंसान में किसी के भी प्रति अविश्वास का भावः आता है तो वह परेशान होता ही है|  अविश्वास तथा अस्वीकृति का भावः किसी को भी सहज रूप से स्वीकार नहीं होता| यह तथ्य इंसान समझ सकता है तथा प्रमाणित भी कर सकता है|

यहाँ पर यह समझना अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है कि इंसान में ऐसा क्या है जो उसे जानवर से अलग बनाता है तथा वह क्या है जो इंसान को विध्वंसकारी क्रियाकलापों में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है?

जानवर के लिए अपने शरीर से जुडी हुई आवश्यकताओं को पूरा करना ही जीने का उद्देश्य बना रहता है| अगर वो पूरी हो रही हों तो उससे ज्यादा की उसे आवश्यकता महसूस नहीं होती| जबकि इंसान के लिए शरीर से जुडी हुई आवश्यकताओं का ही पूरा होना पर्याप्त नहीं होता| इंसान को उससे ज्यादा की आवश्यकता महसूस होती है| जैसे स्वयं में विश्वास तथा सम्मान पूर्वक जीने की चाहना, सुखपूर्वक जीने की चाहना, ज्ञान की चाहना, अपने जीने के हर आयाम में समाधान होने की चाहना, स्वयं में तथा परिवार में समृद्धि होने की चाहना, दूसरे व्यक्ति के साथ परस्परता में विश्वास होने की चाहना, समाज में अभय की चाहना, प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की चाहना|  इंसान में अपनी इस चाहना और इसकी पूर्ती कैसे हो इसकी नासमझी के कारण ही उसकी सारी समस्यायें हैं| स्वयं में स्वयं की नासमझी ही सभी मानव समस्याओं का मूल कारण है| स्वयं की समझ से ही समझ में आता है की मैं क्या चाहता हूँ और किन चीज़ों से वो पूरा होगा| स्वयं में स्वयं की आवश्यकता तथा वह कैसे पूरी हो इस ज्ञान का अभाव ही इंसान को विध्वंसकारी क्रियाकलापों में संलग्न होने के लिए प्रेरित करता है|

अगर हम ध्यान से देखें तो इंसान के दो ही मूल प्रश्न हैं, मैं क्या चाहता हूँ? और वह कैसे पूरा हो?
हर इंसान स्वयं मैं सुख, शांति, संतोष तथा आनंद चाहता है और परिवार मैं समृद्धि, समाज में अभय तथा प्रकृति में सह-अस्तित्व चाहता है| स्वयं में सुख का प्रकाशन ही संबंधों में उभय तृप्ति का आधार बनता है, जिससे ही परस्परता में विश्वास की शुरुआत है| स्वयं में समझदारी तथा परस्परता में विश्वास का ही प्रकाशन समाज में अभय और समाज में अभय का ही प्रकाशन है प्रकृति में सह-अस्तित्व| यहाँ से यही समझ में आता है की सभी मानव समस्याओं का मूल कारण इंसान में समझदारी का अभाव ही है| इंसान में समझदारी ही उसके खुद के सुख का भी आधार है| स्वयं में ज्ञान, समाधान ही स्वयं में सुख है| ज्ञान का अर्थ है स्वयं में स्वयं, अस्तित्व तथा इंसान की अस्तित्व में भागीदारी का ज्ञान|

Is Attachment a Relationship?

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Generally we feel that the more strong our Attachment is with other person more strong is our Relationship with that person, but in reality Attachment is not a Relationship.

Attachment always comes with fear. Fear of loosing other person, fear of loosing acceptance of other person, fear of decrement of feeling in other person for us. Attachment always demands a lot. When our demands are not fulfilled we get hurt and want other person to fulfill our demands on any cost. Attachment generates fear, hatred, jealousy and many other unfulfillable feelings in us, which makes us unhappy and we start making plans to become happy again in which we make others unhappy. We may not be aware of this negative side of attachment but yes it is there! It just need to be looked into. Attachment and Relationship can not go together.

Even a slight variation in feeling of other person hurts us. Attachment is nothing but dependence of our feeling for other person on other person’s behavior, feelings and thinking towards us. It is a kind of dependence. As soon as other person’s behavior, thinking, perception, feeling towards us shakes we get hurt. Our feeling for other person is always uncertain in this case. We always have a fear of uncertainty of other person’s feeling towards  us. We always keep trying to ensure continuity of feeling of assurance in other person for us, so that we are secure, we are happy, we feel related, we feel good. We are always disturbed about the uncertainty of other person’s feeling, thinking towards us, we are always in fear. Fear and feeling of Relationship can not go together. In some cases we see that this Attachment in us become so strong that when other person remains no longer same with us as he/she was before we are ready to even kill that person.

At the first place the question which comes is, why do we get Attached?

A human being by birth has this expectation of living with Happiness. He wants Certainty, Consistency and Continuity of Happiness. Due to lack of understanding of what Happiness is and how it can be ensured he searches, expects and tries to ensure its continuity in those things where it can not be ensured. Expectation of Happiness in a thing which can not ensure its Certainty, Consistency and Continuity is called Attachment.

A human being wants to live with Trust (Resolution in all the dimensions) in himself. This expectation of living with Trust in him is ever actively present. Trust in the Self is Happiness. Due to lack of Understanding of Trust in a human being his Trust in himself is dependent on others Trust in himself, his position, his money and things associated with him. Due to lack of understanding of this Trust only he expects Unconditional Acceptance from others around. Acceptance of others around remains basis of the feeling of Trust in himself. This dependence of this feeling of Trust in him on these things is what is called Attachment and this is the problem of all the human problems. Due to lack of understanding of Happiness and Trust only he expects consistency in others feelings, thinking, behavior towards him and when that is not ensured he gets hurt and then wants to hurt others.

Trust is understanding of one’s absolute value in oneself.

Due to lack of understanding of one’s own value in oneself one recognizes it with the help of others perception towards him, his position, his money, his bodily beauty, his power, his status, his intellect and many other aspects. He recognizes his value relatively, according to the popular notions of society and many more things. Whoever makes him feel valuable or good he feels attraction towards him. His dependence on him keeps increasing with time if other person keeps making him feel good and valuable. The more dependent he is on other person the more severely he gets hurt when feeling of other person changes for him.

Every human being wants to feel secure. Secure in terms of physical facilities required and also in terms of emotional and mental security. Here I will talk about emotional and mental security. With whomsoever he feels emotionally and mentally secure, he start becoming dependent on him. Whoever makes him feel comfortable, secure, valuable he feels good with him. He feels valuable and secure with many more things also like his position, intellect, money he has etc. Whoever makes him feel less valuable for the thing for which he feels valuable he gets hurt. He start getting feeling of opposition for that person. He wants to get “up” from that person. It gives rise of a rat race which we already see.

The problem which comes here is, this feeling of security, comfort and being valuable which one tries to ensure from these things doesn’t ensure its certainty, consistency and continuity. One doesn’t recognize this fact that it is not able to ensure him continuity of feeling of security, so one keeps trying to ensure continuity of feeling of Security, Trust and Happiness from those things which can not ensure it. This is what becomes source of unhappiness, dissatisfaction in him.

Ultimately the whole issue boils down to understanding of one’s own absolute value, understanding what Security is, what Trust is, what Happiness is. Understanding one’s absolute value in existence is what is Trust, is what is Happiness.

Relationship in reality is free from all kind of Attachments. It is a kind of Unconditional Acceptance for other person. It is not because of something in other person. It is just Acceptance without any reason. This kind of feeling is what is Certain, Consistent and Continuous. When one starts recognizing his absolute value his dependence on recognizing his value on other person keeps decreasing. He starts loosing his fears. His Acceptance for other person start becoming more and more Unconditional. This is what is the way towards Happiness and Mutual Fulfillment in Relationships.

To understand Trust, Respect, Happiness, Acceptance, Relationships etc. we need Knowledge. Knowledge includes Knowledge of Self, Knowledge of Entire Existence and Knowledge of Natural Human Conduct.

Being Non-Judgmental

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We do not like to be judged. We like to be with people who are non-judgmental. When we are with such people we feel secure. We feel liberated. We feel that we can talk about anything, say anything and do anything. When we are with people who we feel are very judgmental and we feel that we will be judged on our every action and every word then we feel constrained, we feel discomfort, we feel suffocated. Same is the case with other person. As soon as other person starts feeling that he is being judged by us he starts running away from us. He starts feeling suffocated. He looses his freedom in front of us. Generally we all like to be with people with whom we have assurance of right and consistent judgment. We feel uncomfortable with people with whom we feel the possibility of being wrongly judged. We want to be rightly judged.

If we see our upbringing then we are all trained to judge people on the basis of their behavior and work. We categorize various kinds of thinking, feeling, behavior and works of people in categories of good and bad. Even there we make these levels of good and bad, that such kind of thinking is better than other, such kind of feeling is better than other and so on. The more we find other person’s thinking, feeling, behavior and work in alignment of our preferences of good the more good opinion we make about other person. Similarly we make the bad opinion. The kind of opinion we make about other person governs our behavior with other person.

In our entire upbringing, environment we are trained with patterns.  Patterns of good and bad. This kind of behavior is good, that kind of behavior is bad. This way of thinking is good, that way of thinking is bad, this kind of feeling is good, that kind of feeling is bad. Love is good, hatred is bad. All these kind of patterns contribute to our perception towards the world and ourselves. The more patterns I have learned the more judgmental I become.

If we see closely then our parents, our teachers, our society, our environment and everything around, is making us to learn such kind of patterns. In the childhood itself, we are taught by our parents, “Do not play with that kid, do not play with this kid”, “This is our relative, that is not”, “This way of behavior is good, that way is bad”, “if behavior is this then intention is that”, “he is your competitor, he is your friend, do not share with your competitors”, “this way of thinking is good and that is bad” and many more. We are trained with different patterns and also what pattern is assumed to be good and what bad. The kind of patterns we have learned governs our perception, feelings, thinking towards people around us.

What these patterns have given to us? Power of rejection. We reject people on the basis of their incompatibility with our patterns. The more patterns I have learned the more judgmental I become, the more power of rejection I develop, less number of people I feel comfortable with, less number of people feel comfortable with me, the more lonely I feel and then I blame others that people do not understand me. What is more important is to understand why something is good and why something is bad.

If we notice then a small child is free from such kind of patterns. He does not judge people on the basis of such kind of patterns because he has not learned any till now. He assumes people to be good, he trusts them unconditionally, he respects them unconditionally. His feeling for others remain consistent. He accepts others unconditionally.

These patterns which we are trained with right from the time we are born are responsible for maximum number of problems which we see in society today. These problems are spread at all the levels of our living. At the level of Self, at the level of family, society and nature.

These patterns which I have learned from the childhood and this judgmental attitude increases my power of rejection, non-acceptance. The more patterns I learn the more judgmental I become, the more I mistrust, the more inconsistent my feeling is for others, then more unhappy I am and the more unhappy I make others.

Feeling of Non-Acceptance for other person is not Naturally Acceptable to a human being. As soon as he gets this feeling of Non-Acceptance he troubles himself. This feeling of Non-Acceptance becomes cause of unhappiness in a human being and then he starts planning to cause unhappiness to other human being. It ultimately becomes mutually destructive. I am unhappy and I make other person unhappy.

The more power of rejection I have, the more judgmental I am, the less comfortable people feel with me. It creates an environment of mistrust and insecurity. Mistrust creates fear. It leads to several problems which we see in family, society and nature today.

We all want to be Accepted from others around us Unconditionally, but lack the capability to Accept others Unconditionally. The kind of patterns we learn, the kind of environment we have created has trained us to not to accept easily and to mistrust, but we all want to get accepted from others unconditionally. It gives rise to situation where everybody wants to get accepted from other person but nobody has this capability to accept.

Unless we recognize the True Nature of a human being and keep being driven by these patterns which we have learned since childhood, we can not make ourselves happy and can not make others around us happy. Understanding ourselves only gives rise to understanding the nature of a human being, which brings more consistency in our feeling towards other person and we keep becoming more free from patterns. It bring more consistency in our feeling and behavior towards other person with which other person also start feeling comfortable, which leads to Mutual Trust and Fearlessness. Starting of Happiness is from ourselves and Not from other person. If I am happy then only I can make family, society happy. Generally we feel that Happiness need to be ensured outside, it actually need to be ensured inside.

To understand Happiness, Trust, Respect, Acceptance etc. we need Knowledge.

Knowledge includes understanding related to:-
Self,
Family,
Society,
Nature.

विचार और विचारक

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हम सभी विचार करते हैं, कई सारी चीज़ों पर विचार! पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि विचार करने वाला है कौन? क्या आपको पता भी है विचारक के अस्तित्व के बारे में? अक्सर तो हम ही उस विचारक को जन्म देते हैं| कभी हम सोचते हैं कि हम अच्छे हैं तो हम अच्छे बन जाते हैं और अच्छा महसूस करते हैं| कभी हम सोचते हैं की हम बुरे हैं तो हम बुरे बन जाते हैं और बुरा महसूस करते हैं| कभी कोई हमारी तारीफ कर देता है तो हम अपने आप को तीस मार्खा समझने लगते हैं, कभी कोई बुराई कर देता है तो छोटे हो जाते हैं| कभी हम सोचते हैं हम सुन्दर हैं, कभी धनवान, बलवान, समझदार, मूर्ख इत्यादि| जैसा भी हम अपने बारे में विचार करते हैं वैसी ही हम अपने बारे में अवधारणा बनाते हैं, वैसा ही हमारा विचारक के बारे में विचार बनता है|

यहाँ पर जो चीज़ देखने वाली है वह यह है की विचारक को हम ही जन्म दे रहे हैं| जैसा विचार वैसा विचारक| यहाँ तक कि हमारी विचारक के प्रति अवधारणा पल पल बदलती रहती है| जैसी हमारी मान्यताएं रहती हैं अच्छी बुरी वैसा ही हम विचारक को मानते हैं| बचपन से ही हमने कई सारी मान्यताएं बना रखी होती हैं| ये अच्छा है, वो बुरा है, ये ऐसा है, वो वैसा है आदि| जिस भी चीज़ के बारे में हम अच्छा मानते हैं उस चीज़ से अपने जुडाव से हम विचारक के बारे में अच्छी अवधारणा बनाते हैं और उस चीज़ के खुद से अलग हो जाने पर हम विचारक को छोटा महसूस करते हैं| हमारा विचारक के बारे में विचार पल पल बदलता रहता है| अगर आज मेरे पास धन है तो में विचारक को धनवान मानता हूँ और अच्छा महसूस करता हूँ| कल अगर मेरे पडोसी के पास मुझसे ज्यादा धन आ जाता है तो मैं स्वयं को दरिद्र पाता हूँ, अपने बारे में दरिद्र होने की अवधारणा बनता हूँ और विचारक को दरिद्र घोषित कर देता हूँ और बुरा महसूस करता हूँ| स्वयं को दरिद्र पाने पर में वापस से समृद्ध होने का प्रयास करने लगता हूँ|

यहाँ पर यह तो काफी साफ़ नज़र आता है कि विचार ही विचारक को जन्म दे रहा है| विचारक के स्वतंत्र अस्तित्व के बारे में हमें ज्ञान नहीं है इसीलिए हमारी विचारक के प्रति अवधारणा बदलती रहती है| अगर विचारक के प्रति वह अवधारणा हमारी मान्यताओं के अनुसार अच्छी है तो हम अच्छा महसूस करते हैं, अगर बुरी है तो हम बुरा महसूस करते हैं| यह अच्छी और बुरी मान्यताएं हमारी बचपन से लेकर अभी तक की कमाई है| जैसी कमाई, वैसा विचार, वैसी ही विचारक के बारे में अवधारणा|

यहाँ पर प्रश्न यह खडा होता है की विचारक के बारे में अवधारणा की अस्थिरता से फरक क्या पड़ता है? हमारी हमेशा यह अपेक्षा रहती है कि हम अपने बारे में अच्छा महसूस करें| यह अच्छा हमारी मान्यताओ पर निर्भर रहता है| जिस तरह की भी मान्यता के आधार पर हम विचार करते हैं विचारक के प्रति वैसी ही अवधारणा बना लेते हैं| अगर हमारी अवधारणा अच्छी हो तो हम अच्छा महसूस करते हैं और अगर बुरी है तो हम बुरा महसूस करते हैं| यह अवधारणा अलग अलग विचार के आधार पर बदलती रहती है| मान्यता के आधार पर बनी हुई अवधारणा में स्थिरता नहीं बनी रहती जिसके कारण ही हमें दुःख होता है| जब हम अपने ही विचार के आधार पर स्वयं को अच्छा नहीं पाते हैं तब हमें दुःख होता है| यहाँ पर यह देखना और जानना अत्यंत ही आवश्यक हो जाता है कि हमारे विचार और मान्यताओं का स्रोत क्या है| अक्सर हमारे विचार और मान्यताओं का स्रोत हमारा वातावरण, शिक्षा, माता पिता, अभिभावक आदि ही रहते हैं| हमारी मान्यताओं और विचारों का स्रोत बाहर ही रहता है| बाहर की किसी न किसी चीज़ पर निर्भर ही रहता है| जब तक ये मान्यताएं और विचार बाहर के किसी भी स्रोत पर इस तरह से निर्भर रहेंगे तब तक हमारी विचारक के प्रति मान्यता में अस्थिरता बनी ही रहेगी और हमें दुःख होता ही रहेगा| यहाँ पर स्वतंत्र विचार कि आवश्यकता महसूस होती है| स्वतंत्र विचार सही कि समझ के बिना नहीं हो सकता| सही कि समझ के लिए हमें ज्ञान चाहिए| सही ज्ञान से ही सही मान्यता, सही मान्यता से ही स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र भावः संभव है| सही ज्ञान का अर्थ ही है विचारक तथा संपूर्ण अस्तित्व के बारे में सही ज्ञान| जीवन तथा अस्तित्व का ज्ञान ही ज्ञान का अर्थ है|