Monthly Archives: April 2009

दुनियादारी और समझदारी

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अभी के वक़्त में दुनियादारी का मतलब जो लगाया जाता है वह है, राजी काजी लोगों से अपने काम निकलवाने का हुनर| इसी को ये तथाकथित समझदार लोग समझदारी भी मानते हैं| अंग्रेजी में इसी को प्रेक्टिकल होना कहा जाता है| जैसे कैसे भी कर के अपना लाभ, आराम और मजा बढाने की कला को दुनियादारी का नाम दिया जाता है| अगर हम अपने जीने को ध्यान से देखें तो हम सभी दुनियादारी की इस परिभाषा में पूरी तरह से लिप्त हो चुके हैं तथा इसी दुनियादारी का ही प्रचार प्रसार करने में लगे रहते हैं|

यहाँ तक की हमारी शिक्षा प्रणाली, हमारे माता पिता, हमारे अभिभावक, हमारे आस पास के लोग, हमारा पूरा समाज भी हमें यही दुनियादारी की ही पट्टी पढाते हैं| बचपन से लेकर आज तक हमें यही सिखाया जाता है| बचपन से ही हमें प्रतोयोगिता में छोड़ दिया जाता है, कक्षा में प्रथम आओ, अच्छे अंक लाओ, ज्यादा लोगों को मत बताओ और उनसे जितना हो सके बटोर लो| अब हर बच्चा तो कक्षा में प्रथम आ नहीं सकता, अगर मैंने आप को बता दिया तो आप प्रथम आ जाओगे और मेरे सफल होने के लिए मेरा प्रथम आना जरूरी है| इस प्रणाली में आपसी सहयोग की कोई जगह नहीं है| हर व्यक्ति मेरा प्रतियोगी है, सहयोगी नहीं| ये है हमारी दुनियादारी| पूरी की पूरी शिक्षा में यही है, पैसा और प्रतिष्ठा कमाने की होड़, चाहे वो प्राइमरी स्कूल की पढाई हो, चाहे वो दसवी के बोर्ड के एक्साम, आई आई टी, कोलेज की पढाई या नौकरी| और इसी को सफलता का नाम दिया जाता है|

यहाँ तक की अभी के सिस्टम में कैसे अपने लाभ, आराम और मजे को बढा लिया जाए इसकी ट्रेनिंग देने के लिए कई सारे शिक्षण संसथान खुल गए हैं| उन शिक्षण संस्थानों में दाखिला पाना बहुत ही ऊंची चीज़ मानी जाती है, सफलता का प्रतीक माना जाता है| वहां पर यही सिखाया जाता है कि जो हो रहा है वो तो सही ही है, उसमें रहते हुए अपने लाभ को कैसे बढाएं| और तो और जो इस लाभ को बढाने की कला में जितना पारंगत हो जाता है उसको उतना ही अधिक पैसा मिलता है, वही समाज में प्रतिष्ठा पा रहा है, वही सफल कहलाया जा रहा है और सबसे बड़ी बात, वही व्यक्ति बाकी लोगों के द्वारा उनके लिए निर्णय लिए जाने के लिए प्रतिनिधि के रूप में चुना जा रहा है, ऊंचे पद पर स्थापित किया जा रहा है| उसी व्यक्ति को प्रेक्टिकल माना जा रहा है, दुनियादारी की कला में पारंगत माना जा रहा है, समझदार माना जा रहा है| यह है हमारी समझदारी और सफलता की परिभाषा|

लाभ और प्रतिष्टा को बढा लेने का हुनर है दुनियादारी| इस दुनियादारी ने हमारे घरों को भी नहीं छोडा| घरों में भी पैसे, जमीन, जागीर को लेकर झगडे चलते रहते हैं| दो भाइयों में पैसे को लेकर लड़ाईयां, प्रतियोगिता और झगडे| फिर उनका अलग अलग घरों में रहने लगना, अलग अलग काम करना| किसके पास ज्यादा है, इस प्रतियोगिता की भावना का और अधिक बढ जाना| पहले अगर घर में एक कार थी, तो अब २ चाहिए| अगर कार का मोडल पुराना हो गया है तो अब नया मोडल चाहिए| पहले पूरे घर में एक कार थी, अब पति पत्नी को अलग अलग कार चाहिए, फिर घर के हर सदस्य को अगल कार चाहिए| अगर पडोसी के पास ज्यादा कारें हैं तो हमें उससे ज्यादा कारें चाहिए|  इसे सम्रद्धि, प्रतिष्ठा तथा प्रगति का प्रतीक मानते हैं| यहाँ तक कहते हैं कि अगर यह सब नहीं करेंगे तो प्रगति कैसे होगी| घर में आपस में लड़ते रहते हैं और कार खरीदने, अधिक से अधिक सुविधा जुटा लेने को प्रगति मानते हैं|

समाज के स्तर पर देखें तो वहां पर भी अधिक से अधिक सुविधा के संग्रह को ही प्रगति का आधार माना जाता है| जिस शहर में जितनी बड़ी इमारतें, चमक दमक, बड़े बड़े शोपिंग मोल हों उसे एक प्रगतिशील शहर मानते हैं| गांवों को पिछडा हुआ मानते हैं| गांव का आदमी जो कि गेहूं उगा रहा है उसको छोटा काम मानते हैं और शहर का आदमी जो केडबरी (चाकलेट) बनाने में लगा है उसे बड़ा काम मानते हैं| किसान आत्महत्या कर रहा है और केडबरी बनाने वाला लाखों में खेल रहा है| ये है हमारा अर्थशास्त्र|

अभी प्रगति का आधार अधिक से अधिक आराम और सुविधा जुटा लेना ही है| इसी मानसिकता ने जन्म दिया है लाभोंमादी अर्थशास्त्र को, भोगोंमादी समाजशास्त्र को और कामोंमादी मनोविज्ञान को|

यह लाभ, भोग और काम के उन्माद ने आज हमें क्या दिया है?
१. प्रकृति में असंतुलन| वातावरण के तापमान का बढ जाना, पेडो का काटना, समुद्र में पानी के स्तर का ऊपर उठना, वातावरण, पानी, हवा का प्रदूषण|
२. समाज में अव्यवस्था| जमाखोरी, जालसाजी, कृत्रिम आभाव कि स्थिति, उत्पादन का आभाव, विनिमय का आभाव, असुरक्षित वातावरण|
३. परिवार में झगडे, अव्यवस्था| सम्रद्धि के भावः का अभाव|
4. स्वयं में पीडा, दुःख, असुरक्षा, भय|

क्या यही हम सब चाहते हैं? मुझे नहीं लगता कि कोई भी इसके लिए हाँ कहेगा|

तो प्रश्न यह खडा होता है कि यह सब हो कैसे गया? इस पर ध्यान देने पर यही समझ में आता है कि यह सब तो इंसान कि ना सामझी से ही हुआ है| उपरोक्त पूरे विश्लेषण से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि लाभ, भोग, और काम को आधार बना का व्यवस्था नहीं लायी जा सकती| इससे ना तो इंसान ही खुश है, ना ही परिवार, ना समाज और ना ही प्रकृति में इससे व्यवस्था सुनिश्चित हो पा रही है| 

इंसान ने ही यह आशा लगाई कि लाभ, भोग और काम से वह सुखी हो जायेगा और इस आशा के फलस्वरूप ही उसने इतना बड़ा जंजाल खडा कर दिया और इससे कुछ भी निकल कर नहीं आया| यहाँ पर यह समझना बहुत ही जरूरी हो जाता है कि अगर जो हो रहा है वह नहीं तो फिर क्या? अगर हम ध्यान से देखें तो यह दीखता है कि प्रकृति के स्तर पर जो असंतुलन है, समाज के स्तर पर जो असंतुलन है, परिवार के स्तर पर जो असंतुलन है वह है तो इंसान की, याने की हम लोगों की नासमझी के कारण ही है|

यहाँ पर यह समझना बहुत ही जरूरी हो जाता है की इंसान क्या चाहता है? और वह कैसे पूरा होगा?
इंसान चाहता है सुख, सम्रद्धि, संबंध और इन तीनो की निरंतरता| हर इंसान स्वयं में सुख, परिवार में संबंधों में सामरस्यता, समाज में अभय और प्रकृति में सह-अस्तित्व चाहता है| यही मानव का लक्ष्य है, इसकी तरफ बढना ही प्रगति है, यही सम्रद्धि का आधार है, यही सुख है| अगर हम ध्यान से देखें तो इंसान की इस मूल चाहत के बारे में हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई बात नहीं होती जिसके ही कारण आज हम यहाँ पहुच गए हैं| अभी की शिक्षा प्रणाली सिखाती है लाभ, आराम और मजे को कैसे बढाएं, जबकि उसे सिखाना चाहिए स्वयं में व्यवस्था, संबंधों में विश्वास, समाज में व्यवस्था और प्रकृति में संतुलन कैसे सुनिश्चित करें|

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हम क्यों पढ़ रहे हैं?

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पैसा और प्रतिष्ठा कमाने के लिए| पैसा और प्रतिष्ठा कमाने के लिए ही हमारी सारी पढाई हो रही है| बचपन से लेकर आज तक वही एक उद्देश्य हमारी पढाई के लिए रहा है|

पैसा और प्रतिष्ठा ही क्युकि हमारी पढाई का उद्देश्य है इसलिए जिन विषयों से हमें ऐसा लगता है कि हमें पैसा और प्रतिष्ठा कमाने में अधिक सहायता मिलेगी हम उन विषयों में संलग्न हो जाना चाहते हैं| कौन से विषय से कितना पैसा कमाया जा सकता है यह उस विषय के बाजार में मांग पर निर्भर करता है| अगर आजकल सोफ्टवेयर का बाजार में बहुत अधिक चलन है और उससे पैसा कमाने की अच्छी गुंजाईश उपलब्ध है तो अधिक से अधिक लोग सोफ्टवेयर इंजिनियर बन जाना चाहते हैं| पूरा समाज, लोग, उनके सोचने का नजरिया उसी हिसाब से बदल जाता है| माता पिता अपने बच्चों को फिर सोफ्टवेयर इंजिनियर ही बनाना चाहते हैं| बच्चों को भी पता नहीं होता कि वो क्या पढने जा रहे हैं| उनको तो बस इतना ही पता होता है कि सोफ्टवेयर इंजिनियर बन कर ही सफल, सम्रद्ध हुआ जा सकता है जिसके कई सारे उदाहरण तो उनके सामने उपलब्ध रहते ही हैं|

सफलता, सम्रद्धि की इन्ही मान्यताओं के आधार पर वे उन विषयों को पढने लगते हैं जिनके बारे में उन्हें कुछ पता भी नहीं होता| उन्हें तो बस इतना पता होता है कि ये विषय पढ़ कर ही अच्छी आजीविका कमाई जा सकती है, समाज में प्रतिष्ठा कमाई जा सकती है, सफल हुआ जा सकता है और एक सुरक्षित जीवन जिया जा सकता है| उनकी यह अपेक्षा गलत भी नहीं है, पर क्यूंकि वे जो विषय पढ़ रहे होते हैं उनमें उन्हें रूचि नहीं होती तो उन विषयों को पढने का उद्देश्य सिर्फ अच्छे नंबर लाना ही रह जाता है, ताकि उनको बाद में अच्छी नौकरी और और प्रतिष्ठा मिल सके| इसके कारण पढाई करने की यह यात्रा बड़ी ही कठिन हो जाती है| जिन विषयों को पड़ने में मेरा मन नहीं लगता उनको पढने के लिए मुझे काफी रटना पड़ता है, जो अपने आप में काफी दुःखदाई काम है| कई लोग पढ़ नहीं पाते अच्छे नंबर नहीं ला पाते तो उनके माता पिता परेशान हो जाते हैं| वे खुद भी काफी दबाव में आ जाते हैं| आसपास के लोग क्या कहेंगे, अच्छी नौकरी लगेगी या नहीं और भी कई सारी अनिश्चितताएं उनको और उनके माता पिता को परेशान करने लगती हैं, जो की काफी स्वाभाविक है|

यहाँ पर अगर ध्यान से देखा जाए तो यही देखने में आता है कि हमने अपने आसपास जो भी मोडल, वातावरण बनाया हुआ है उसमें अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमाना ही मूल उद्देश्य नज़र आता है| इस मोडल में भी काफी अस्थिरता अनिश्चितता बनी रहती है| आज जो विषय बाजार में मांग पर है, जरूरी नहीं की कल वह मांग में रहे ही| देखने में आता ही है कि किस तरह सोफ्टवेयर का बाजार हिलता डुलता रहता है| जरा सा बाजार हिला और आपकी आजीविका और प्रतिष्ठा दाव पर आ गयी| एक चीज़ और जो होती है वह यह है कि जिस विषय की बाजार में मांग होती है उस विषय से जुड़े हुए काम में लगे लोगों को अधिक पैसा तो मिलता ही है साथ ही उसे बाकी कामों से अधिक प्रतिष्ठित काम भी मान लिया जाता है| जिसके कारण अधिक से अधिक लोग उसमें आ जाना चाहते हैं| गांवों से लोग अपने बच्चों को शहरों में पढाई के लिए भेजते हैं ताकि वे भी अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमा सकें| गांवों में ऐसा नहीं है कि उनके पास संसाधनों की कमी होती है| बल्कि गाँव में उन्हें पर्याप्त भोजन की आश्वस्ति, गाय का असली दूध, रहने की अच्छी जगह आदि सब चीज़ों की आश्वस्ति होती है, पर वे शहर में आ जाना चाहते हैं| प्रचलित मान्यताओं के आधार पर पैसा और प्रतिष्ठा पाना चाहते हैं| गांव के वो लोग जो अपने गांव में राजा या मालिक की तरह रहते थे वे शहर में आकर भिखारियों जैसा जीवन व्यतीत करते हैं| ना तो पैसा ज्यादा कमा पाते हैं, प्रतिष्ठा तो बहुत ही दूर की बात है| यह लाभ तथा प्रतिष्ठा का उन्माद उन्हें कहीं का छोड़ता|

नौकरी में आ जाने के बाद भी नौकरी करने का उद्देश्य केवल पैसा और प्रतिष्ठा कमाना ही रहता है| दफ्तर जाना, वापस आना, सोना, फिर दूसरे दिन वापस जाना, पैसा इकट्ठा करना, लोन चुकाना, हफ्ते के आखिरी दिनों में घूमना फिरना, बस इतना ही रह जाता है जीवन|

अगर हम ध्यान से देखें तो यहाँ तक कि आज शिक्षा के नाम पर जो दिया जा रहा है वह भी अधिक से अधिक पैसा और प्रतिष्ठा कमाने की ट्रेनिंग ही दी जा रही है| जिसके कारण ही आज यह स्थिति आ गयी है कि अर्थशास्त्र लाभुन्माद पर आधारित है, समाजशास्त्र भोगुन्माद पर और मनोविज्ञान कामुन्माद पर| शिक्षा का असली प्रयोजन लोगों की नौकरियां लगवाना नहीं बल्कि समझदार, इमानदार, जिम्मेदार इंसान बनाना है|

हर इंसान की जन्म से ही कुछ मूलभूल आवश्यकताएं होती है जिनकी सही पहचान उसको खुद को ही नहीं रहती जिसके कारण ही सारी समस्याओं का जन्म होता है| जैसे,
१. हर इंसान सुखपूर्वक जीना चाहता है पर उसे सुख क्या है और वह कैसे सुनिश्चित होगा इसकी समझ नहीं होती|
२. हर इंसान जन्म से ही अपने आसपास के लोगों से निरपेक्ष स्वीकृति की अपेक्षा रखता है, उसकी यह अपेक्षा रहती है कि उसके आस पास के लोग उस पर विश्वास करें, उसका सम्मान करें और किये ही रहे, पर उसमें स्वयं में अपने आसपास के लोगों को स्वीकृति प्रदान करने तथा व्यवहारिक रूप से मिल जुलकर काम करने की योग्यता नहीं रहती|
३. हर इंसान जन्म से ही सत्यवक्ता है, सही कार्य व्यवहार करना चाहता है पर उसमें सही व्यवहार तथा कार्य कर पाने की योग्यता नहीं रहती|
४. हर इंसान बचपन से ही ज्ञान का प्यासा है पर उसे ज्ञान का अर्थ स्पष्ठ नहीं रहता, वह अपनी इस प्यास से अनभिज्ञ रहता है और हमारी अभी की शिक्षा प्रणाली, समाज, माता पिता उस प्यास की हत्या कर देते है|

हमारी अभी की जो शिक्षा प्रणाली है उसमें उपरोक्त ४ में से किसी भी विषय पर बात नहीं होती| जबकि ये ४ मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताएं है| इन आवश्यकताओं के पूरा ना हो पाने के कारण ही इंसान में असंतुष्टि बनी रहती है जिसे पूरा करने के लिए वह कई सारे गलत काम करने को भी तैयार हो जाता है|

यहाँ पर यही समझ में आता है कि शिक्षा का असली प्रयोजन इंसान में सही करने कि योग्यता को विकसित करना है ना कि पैसा कमाने कि योग्यता को विकसित करना| इसे करने के लिए शिक्षा में इंसान और उससे जुडी हुई आवश्यकताओं पर बात होना अत्यंत आवश्यक है|

Rich, Poor and Prosperous

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A person who lacks facility and money is Poor.

A person who has facility and money is Rich.

Who is Prosperous then?

Lets first do the comparison of Rich and Poor.

A Poor person is deprived because he lacks even the necessary facilities. A Rich person is deprived because he feels that what he has is not sufficient for him and wants more. Both are suffering from deprivation.

A Poor person is ready to exploit because his basic necessities even are not getting fulfilled. A Rich person is ready to exploit because of his feeling of deprivation. In fact a Rich person has more capability to exploit in current system.

A Poor person is lacking facilities and is unhappy (Sadhan Vihin Dukhi Daridra). A Rich person is having facilities and is unhappy (Sadhan Sampanna Dukhi Daridra).

The question which comes here is, what is the source of deprivation in a Rich person?

There are many factors here. In fact one of the major contributing factors of poor being poorer is the feeling of deprivation of Rich. Also when a Poor start becoming a Rich he also starts suffering from the feeling of deprivation like Rich. Some of the factors for feeling of deprivation of Rich are:-

1. Lack of understanding of how much is needed.

2. Peer Pressure, a kind of Fear. If I do not confirm to the standards in society where I sit, then I will loose respect.

3. Enticements, Misconceptions and Misunderstandings like, if I have More Resources then I will get More Respect in the society, I will have Better Relationships with people, I will be More Happy.

4. Lack of assurance in Relationships that I will be taken care of by my relatives, when my body is not capable of production of resources.

5. Lack of assurance of availability of needed resources in future.

All of these above factors make a Rich person Poor, deprived.

So what is required to make a Rich person really Rich?

1. Right Understanding within every individual of what he really wants? How can he fulfill that? What Material/Resource can do? What relationships are? What are the expectations involved in Relationships? What kind of society he really wants?. What material is needed for and How much of it is needed. This understanding need to be ensured within every individual.

2. When one has Right Understanding then one has Confidence in what he feels and is doing, then Peer Pressures and Fears automatically start going down.

3. Right Understanding of Relationships within every individual. Understanding that Resources can not ensure fulfilling Relationships and Respect due to Resource doesn’t have certainty, consistency and continuity and one needs continuity of Respect.

4. Assurance in Relationships among family members. It gives all of them the Happiness in fulfilling Relationships as well as the assurance of continuity of Production in house and also the assurance to be taken care of.

5. When there is Right Understanding within every individual, Assurance in Relationships in every family, Prosperity in every family, then continuity of culture of Right Understanding, Assurance in Relationships among families leads to Fearlessness in society. This assures the continuity of availability of resources in future too.

6. A harmonious society automatically becomes complimentary to the Nature. It takes care of Nurturing, Protection and Right Utilization of Nature.

All this starts from the Right Understanding in an individual. Right Understanding in an Individual makes him to understand how much he needs and if he “feels” that he has more than what he needs and also have “assurance” of having more than what he needs in future then he feels Prosperous.

Prosperity is a “feeling” of having more facilities than what is needed.

The important point here to notice is, Prosperity is a “Feeling”. A Rich person “feels” that he “lacks” that’s why he is not Rich.

So you are Rich, Poor or Prosperous?

And, what do you want to be? Rich, Poor or Prosperous?

Being Prosperous is the basic need of every human being. Happiness, Prosperity and Continuity of these two is the basic requirement of a human being. To ensure this basic requirement all of us need to ensure,

Right Understanding within every individual,
Prosperity in every Family,
Fearlessness in Society and
Co-Existence in Nature.

Forgiveness ..

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To not to be able to forgive and inability to take revenge keeps killing you continuously inside.

We see that sometimes we get into an altercation with somebody or somebody says something to us with which we start feeling that we are being looked upon down, we are being wrongly evaluated, other person is trying to hurt us intentionally or other person did something wrong with us when he had option of not doing it, then we get hurt. We get angry. We want to teach a lesson to other person. We keep doing a calculation within ourselves continuously about how to teach a lesson to that person or we keep doing several arguments within ourselves to prove to us that we are right. When we see/confront that person then it reminds us of that feeling of hurt again. Every action of other person his smile, his gesture, his walking style, his entire body language, his words everything looks negative to us. Everything in him increases our feeling of hurt. With time this feeling of hurt keeps multiplying. We also start seeing every previous action of that person as negative. The more we dig into our memories about our interactions with that person the more we hurt ourselves and increase the willingness to teach a lesson to that person. If other person is the one who has been close to me since a long time then it hurts me more.

If somehow we empathize with that person or feel that he did not intend to hurt me or he meant something else than what I assumed or he had no other option than what he did, then we restore our comfort.

We see that all this is happening, but why this is happening?

Feeling of Non-Acceptance for another human being is not Naturally Acceptable to a human being. Till the time a human being has this feeling of Non-Acceptance for another human being he keeps killing himself inside.

At least one is able to see that this feeling of Non-Acceptance for another human being is very painful. As I described above, all those things happen and keep your mind occupied. In fact when a human being has this feeling of Non-Acceptance for other human being he spends all his energies to come out of the pain which he is feeling out of that feeling of Non-Acceptance. To come out of this pain, he plans to take revenge, he comes up with several arguments in his defense and also to teach a lesson to other person, his feeling for other person changes, he starts undermining other person and several more such things happen.

The thing to notice here is, once we get a feeling of Non-Acceptance for other person we try to do several such things which I described above. In all those methods we may be able to secure our comfort with that specific other person for some time but the possibility of this feeling of Non-Acceptance to come within us still remains available, with that person or with some other person again. On the other hand suffering with this feeling of Non-Acceptance is not Naturally Acceptable to a human being, so there is a need to identify the root cause of the problem and work over there so that this feeling of Non-Acceptance never comes again.

The root cause of this problem lies in the inability to recognize the root expectation/desire within a human being and means to fulfill it. This root desire/expectation is of Unconditional Acceptance in a human being from others around. A human being by birth has this expectation of Unconditional Acceptance from others around but lacks the competence to give it to others.

His Acceptance for others remains dependent on others acceptance for him. A human being is not able to accept others  when they are not able to accept him. As soon as he feels that he is being unaccepted by other person then he also start getting a feeling of Non-Acceptance for that person and this feeling of Non-Acceptance hurts him and NOT the Non-Acceptance of other person for him. This can be verified by anybody or needs a verification by everybody.

So ultimately it is the feeling of Non-Acceptance within me which is the source of hurt/pain within me. What all I try to do is to either hurt other person or to convert the feeling of Non-Acceptance in other person for me into Acceptance, anyhow. This creates all problems like hatred, anger, jealousy, competition etc.

To understand Acceptance we need to understand ourselves, so ultimately it comes down to a problem of our own lack of understanding of ourselves.

So when there is Acceptance, forgiveness is automatically there. In fact Acceptance is the basis of forgiveness.

To understand Accepance, Trust, Respect and Relationships we need Knowledge. It includes understanding related to:-
Self
Family
Society
Nature.

अर्थ बदल रहे हैं ..

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शब्द वही हैं मगर,
अर्थ बदल रहे हैं ..
धुन वही है मगर,
सुनने के नज़रिए बदल रहे हैं|

पत्थर वही है मगर,
देखने के अंदाज़ बदल रहे हैं|
लोग वही हैं मगर,
संबंध के भावः बदल रहे हैं|

वास्तविकता वही है मगर,
दृष्टि बदल रही है|
सत्य तो वही है मगर,
उसे ग्रहण करने की पात्रता बदल रही है|

सीडी दर सीडी कर के,
वास्तविकता खुद को उदघाटित कर रही है,
मैंने तो एक कदम ही बढाया था मगर,
अब यह मुझको अपनी ओर आकर्षित कर रही है|

स्तब्ध रह जाता हूँ में,
यह अत्भुद रचना को देख कर,
दृश्य वही है मगर,
सुन्दरता की परिभाषा बदल रही है|

अस्थिरता की प्रत्यक्षता,
और स्थिरता का अनुमान लिए,
आगे बढता हूँ मैं,
अनुमान की दृढ़ता से,
खुद में अधिक स्थिरता महसूस करता हूँ मैं,
और आगे बढता हूँ मैं|