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सुख स्वभाव

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मानव का स्वभाव सुखी हो कर के जीने का है|  मानव निरंतर सुख चाहता है, हर क्षण सुख चाहता है| ऐसा एक भी क्षण नहीं जब मानव सुख नहीं चाहता| जब मानव सुखी होता है तब वह उसी स्थिति में रहना चाहता है, जब वह दुखी होता है तब वह उस स्थिति से बाहर आ कर के वापस से सुखी हो जाना चाहता है| इससे यह सिद्ध होता है की सुख, केवल सुख, निरंतर सुख ही  मानव की सहज वांछा है| मावन अपने जीवन में सुख की निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता चाहता है|

मानव का हर कार्य सुखी होने के लिए सम्पन्न हो रहा है, भले ही वह इस तथ्य से अवगत हो या नहीं| हर काम इंसान सुखी होने या हो जाने के उद्देश्य से ही कर रहा है| हम सुखी होने या हो जाने के लिए कई तरह के प्रयास करते हैं| गाने सुन लेना, चलचित्र देख लेना, दोस्तों के साथ बातें कर लेना, एक्साम में अच्छे नंबर लाना, माता पिता की अपेक्षाओं को पूरा करना, अपनी अपेक्षाओं को पूरा करना, बड़ी बड़ी परीक्षाओं में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना, अच्छे कोलेजों में दाखिला लेना, पी.एच.डी करना, अच्छी नौकरी पाना, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना, बड़ी गद्दी को पा लेना और भी बहुत कुछ हम करते हैं और यह सब के मूल में सुख की ही आशा रहती है|

यहाँ पर यह देखने में आता है की हम सुख की आशापूर्ति के लिए या तो कुछ करने का प्रयास करते हैं या कुछ पाने का प्रयास करते हैं| जैसे गाने सुन कर के सुखी होना, चलचित्र देख कर के सुखी होना, दोस्तों के साथ समय बिता कर के सुखी होना इत्यादि| इसमें कुछ कर के सुखी होने की चाहना है| दूसरी तरफ़ आता है, कुछ पा कर के सुखी होने की आशा रखना| इसमें आता है, अगर मेरे परीक्षा में अच्छे नंबर आ गए तो मुझे सब शाबाशी देंगे, मेरी सब तारीफ करेंगे और मुझे अच्छा लगेगा और मैं सुखी हो जाऊंगा| अगर मेरा अच्छा जॉब लग गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मेरी पी.एच.डी पूरी हो गई तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं उस प्रतियोगिता में जीत गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मेरी किसी अच्छी लड़की शादी हो गई तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मेरा एक बड़ा घर होगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मेरा बच्चा अच्छे जॉब में आ जाएगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं समाज में प्रतिष्ठा पा लूँगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं ऊंचे पद पर स्थापित हो जाऊंगा तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं धनवान हो गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं बलवान हो गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं रूपवान हो गया तो मैं सुखी जाऊंगा, अगर मैं यशवान हो गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, अगर मैं बुद्धिवान हो गया तो मैं सुखी हो जाऊंगा, इत्यादि| इस तरह से देखने मैं आता है की हमारे सारे के सारे काम के मूल मैं सुख और उसकी निरंतरता की ही चाहना है|

उपरोक्त व्याख्या में दो आयामों की चर्चा हुई, कुछ कर के सुखी होने का प्रयास और कुछ पाने की आशा में सुखी होने का प्रयास या कुछ पा कर के सुखी होने की आशा रखना| इस प्रकरण मे, मैं कुछ कर के सुखी होने के प्रयास के ऊपर चर्चा करूँगा| कुछ कर के सुखी होने के प्रयास में ऐसा देखने में आता है की उससे मिलने वाले सुख में निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं आ पाती| जैसे कुछ देर गाने सुन के मैं बोर हो जाता हूँ, फिर मुझे कुछ और चाहिए होता है| कुछ देर दोस्तों से बात कर लेने के बाद मैं वापस से कुछ चेंज चाहता हूँ, कुछ नयापन चाहता हूँ| कुछ कर के सुखी होने के प्रयास मे ये नयेपन की चाहना बनी ही रहती है| नयेपन की चाहना का यही मतलब है कि मैं जो कर रहा हूँ उसमें मुझे कुछ देर के पश्चात् तृप्ति मिलना कम/बंद हो जाती है, इसीलिए मुझे तृप्ति के लिए किसी नए स्रोत कि तलाश रहती है| यहाँ पर एक चीज़ और भी आती है कि अगर किसी कारणवश मैं पहले से ही काफ़ी परेशान हूँ तो कुछ कर लेने से मुझे कुछ सामायिक आराम भले ही मिल जाए परन्तु तृप्ति नहीं मिल पाती| जैसे अगर मेरे किसी प्रिय मित्र से मेरी लड़ाई हो गई है तो जब तक मैं उस समस्या से बहार नहीं आ जाता, तब तक मुझे कुछ भी करने में आनंद नहीं आ पाता| तब ना तो मुझे गाने अच्छे लगते हैं, ना ही चलचित्र| हर समय मेरा ध्यान इसी ओर रहता है कि वापस से सब पहले जैसा अच्छा हो जाए| इससे यह सिद्ध होता है कि कुछ कर के सुखी होने के प्रयास में निश्चितता, स्थिरता और निरंतरता नहीं बनी रहती, जबकि एक मानव निरंतर सुख कि वांछा रखता है|

दूसरा आयाम रहता है, कुछ पा कर के सुखी होने कि आशा रखना| इसमें मेरी आशा यह बनी रहती है कि अगर मुझे फलानी वस्तु मिल गई तो मैं सुखी हो जाऊंगा| इस तरह की आशा मे मुझे जब तक वह वस्तु नहीं मिलती तब तक मैं स्वयं मे आराम महसूस नहीं करता| बल्कि अगर मुझे कुछ इस तरह का विकल्प दिखता है कि जिसमें मुझे बिना कुछ करे ही वस्तु मिल जाए तो मे उस विकल्प को अपना लेना चाहता हूँ| जैसे, अगर मैं यह मानता हूँ कि परीक्षा मे अच्छे नंबर ला कर के मैं सुखी हो जाऊंगा तो मेरे लिए पढने का उद्देश्य नंबर लाना ही रह जाता है| मेरा पढ़ाई मे मन नहीं लगता, मैं पड़ते समय दुखी रहता हूँ, जिसके कारण मुझे उसमें समय भी काफ़ी ज्यादा लगता है और अगर मुझे ऐसे विकल्प नज़र आते हैं कि जिनमें मुझे बिना पढ़े ही नंबर मिल जाएँ तो मैं उन विकल्पों को अपना लेना चाहता हूँ| जैसे, परीक्षा मे नक़ल करना, नकली प्रमाण पत्र बनवाना, इत्यादि| यहाँ पर देखने की बात यह है कि यहाँ पर मैंने ऐसा माना रहता है कि कुछ पा कर के मैं सुखी हो जाऊंगा, जिसके कारण उस चीज़ को पाने के लिए मे कुछ भी करने को तैयार हो जाता हूँ और जब तक मुझे वह चीज़ नहीं मिलती तब तक मैं स्वयं में तृप्ति महसूस नहीं करता| वह वस्तु मिल जाने के बाद भी मुझ मे यह भय बना रहता है कि वह वस्तु मेरे साथ बने रहेगी या नहीं! और यह भय दोबारा से मेरे दुखों का कारण बनता है| जैसे, अक्सर मुझे यह अच्छा लगता है जब मेरे आस पास के लोग मेरे बारे मे अच्छा सोचते हैं, मुझे ऊंचा देखते हैं| अब मेरा सारा ध्यान इस बात पर रहता है कि मैं कुछ ऐसा करूँ कि लोग मेरे बारे मे अच्छा सोचें| उसके लिए मैं वह सब भी करने को तैयार हो जाता हूँ जो मुझे अच्छा नहीं लगता| पर जो आज अच्छा देख रहा है वह कल अच्छा नहीं देखेगा| इसके कारण मेरे अन्दर हमेशा ही अपने सम्मान को खो देने का भय बना रहता है, जो मेरे दुःख का कारण बनता है| सम्मान जब तक मिला नहीं तब तक मैं उसे पाने कि चाह मे व्याकुल रहता हूँ और जब मिल गया तब मै उसके बने रहने कि चिंता मे लगा रहता हूँ और अगर वो बना भी रह रहा है तो वह मुझे कुछ समय के पश्चात् मुझे निरंतर तृप्ति देने मे पर्याप्त नहीं हो पाता, मुझे उससे भी कुछ अधिक कि आवश्यकता महसूस होती है| इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कुछ पा के सुखी होने के प्रयास मे भी सुख कि निश्चितता, स्थिरता, निरंतरता नहीं मिल पाती|

यहाँ पर यह बात काफ़ी महत्त्वपूर्ण हो जाती है की मानव निरंतर सुख चाहता है, इसलिए उसे सुख के किसी ऐसे स्रोत की आवश्यकता है जिसमें निरंतर सुख प्रदान करने का स्वभाव हो| ऐसे स्रोत कि आवश्यकता है जिससे सुख कि निश्चितता, स्थिरता, निरंतरता सुनिश्चित हो सके| ऐसा सुख का स्रोत समाधान ही है| स्वयं मे समाधान ही सुख है| समाधान से तात्पर्य है स्वयं मे स्वयं तथा अस्तित्व के प्रति ज्ञान|

कुछ कर के या कुछ पा कर के सुखी हो जायेंगे ऐसा नहीं होता है, सुखी तो इन्सान समाधान से ही होता है, समाधानित हो कर के इन्सान जो करता है उसे वह सुखपूर्वक कर सकता है|

Ye andar ki baat hai …

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This is not about any advertisement line. It is a short narration of a same incident on 3 different days.

Day1:-

I was going to my office. From Kothaguda to Hi.Tech city autowalla takes 4 Rs. I sat in Auto, reached Hi.Tech city, he asked me 4 Rs, I gave him.

Day2:-

I was not in good mood this day due to some reason.

I was going to my office. From Kotaguda to Hi.Tech city autowallas have increased the price to 5 Rs and I was unaware of it. I sat in Auto, reached Hi.Tech city, he asked me 5 Rs! I said, “Bhaiya 4 lagta hai”. He started shouting at me. Since I was not in good mood this day, his words increased the intensity of my bad mood. I was angry inside. I did not manifest my anger on him, but I wanted to! I gave him 5 Rs and left the place.

Day3:-

I was in very good mood this day.

I was going to my office. From Kotaguda to Hi.Tech city autowallas take 5 Rs. I sat in Auto, got down at half the distance from Hi.Tech city, he asked me 5 Rs! I said, “Bhaiya 4 lagta hai”. He started shouting at me. Since I was in good mood this day, his words did not affect me at all. My inside state did not change. I gave him 5 Rs and left the place. In fact if this day he would have asked me for 10 Rs for the same distance I would have given him without any problem.

There is something very important to see in here.

When I am in good mood, uncertainties of external environment doesn’t affect me much. If I am in bad mood and if my external environment is not according to my expectations then it really affects me.

So is it really the external environment which affects me? Is it really the external environment which is the cause of my problems? Is it really other person who is making me unhappy?

When a human being is unhappy inside, he expects his external environment to be certain according to his expectations. When a human being is happy inside, uncertainties of external environment does not really affect him, rather he is able to see the uncertainty from a distance i.e without getting himself affected by the problem and is able to empathize with other person if he is doing something wrong.

This is something which I feel is very important and is the root cause of the problems which we see within ourselves, in our family, in our relationships, in our society and even in nature.

A human being naturally expects Certainty, Consistency, Continuity of Happiness. When he is Happy within, he spreads and shares his happiness with others. When he is unhappy within he expects to get happiness from his environment, by expecting Certainty, Consistency and Continuity of external environment according to his all expectations.

This is the root cause of problems like domination, jealousy, hatred, opposition etc. which we see in the society and which we all do not want. But due to lack of understanding of the root cause of problem we keep blaming other person that other person is making me unhappy and other person should be corrected for my happiness. And the fact remains that even if the other person is corrected my possibility to get angry/jealous/hatred etc. with some other person remains available and if I get hurt with that some-other-person again then I want that some-other-person to be corrected. In this way we never take the responsibility of our own Happiness. We feel that it is other person’s responsibility to make me happy and we ourselves are unaware of this feeling/assumption.

Now the question comes, what is Happiness then? If my Happiness is dependent on my external environment then am I ever going to be Happy? So what is the solution?

Solution is, Knowledge.

It is the lack of understanding within an individual(ourselves) at all the levels of his/our living, is the root cause of all the problems which we see at all the levels of our living today.

It is Knowledge which helps us understanding, Happiness, Trust, Respect, Confidence etc. which are the basic requirement of a human being. In lack of understanding of these we tend to fulfill these requirements through other people around us and it gives rise to the situation like two beggers are trying to snatch the coins from each other’s bowl!

Since it starts from my own internal environment, how my external environment would be, so I said, “Ye andar ki baat hai”.

Knowledge includes, understanding related to,

Self
Family
Society
Nature

Mind the Gap!

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mind_the_gap-logoThis is not the gap on a road or the gap between platform and train for which generally this logo is used. This logo is generally used in London underground trains.

The gap which I am referring to here is the gap between “What I currently am” and “What I really want to be”.

Do you see a gap between these two? In myself I do see, a huge gap.

So what is that, that I really want to be? I see that I want to be happy continuously.

It is the continuous Happiness which I really want. I want Certainty, Consistency and Continuity of Happiness. There is never a time when I desire for unhappiness. When I am unhappy I want to come out of that state and when I am happy I want to continue to be in that state, so it implies that it is Happiness which I really want!

This is something which is independent of perceptions. This is something which is inherent in each individual. All the actions of a human being are happening just for the sake of ensuring Happiness and its continuity, without any exception. We do a lot of things, like studying for exams, passing IITs, doing Phds, doing Jobs, earning recognitions, positions, money, marriage, kid etc, expecting unconditional acceptance from others around, liking-disliking people around and a lot more things, but the question still remains, is that all able to give me what I really want? Mind you, I do not discourage doing all above or I do not say that above all is wrong, but the only thing which makes me to think is, is this sufficient for what I really want?

And the next question is, what I currently am? Am I what I really want to be?

If I compare my current state with what I really want to be, then I see that I am not what I really want to be!

Are you?

If I am not then what is the program of action I am going to follow in order to be what I really want to be?